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Sunday, 14 April 2019

समेकित नाशीजीव प्रबंधन (आईपीएम) और आय में वृद्धि


समेकित नाशीजीव प्रबंधन (आईपीएम) और आय में वृद्धि

डॉ. जय पी. राय


कृषि उत्पादकता बढ़ाने के उद्देश्य से उत्पादन तकनीक में वैज्ञानिक विकास लगभग एक स्थायित्व पर पहुँच गया है और किसान की आय को बढ़ाने के लिए उत्पादन तकनीक में विकास के आधार पर फसल उत्पादकता में लघुगणकीय वृद्धि पर्याप्त सीमा तक असंभव प्रतीत होती है । इसलिए, खेती के व्यवसाय से लाभ बढ़ाने के लिए अन्य संभावित विकल्पों पर ध्यान देना आवश्यक हो गया है। पादप संरक्षण तकनीक ऐसी क्षमता प्रदान करती है क्योंकि फसलों में कीटों और रोगों से होने वाले नुकसान काफी अभूतपूर्व हैं और अगर इसे रोक लिया जाय तो इससे फसल की उपज और किसान की आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव हो सकती है।

रासायनिक नाशीजीव नियंत्रण बनाम एकीकृत कीट प्रबंधन:
समकालीन शस्य उत्पादन में, किसान रोग एवं कीट नियंत्रण के लिए अधिकतर शस्य सुरक्षा रसायनों के प्रयोग पर भरोसा करते हैं। हालांकि, किसानों से सीधे संपर्क वाले लोगों की बढ़ती गतिविधियों के कारण, चाहे वे प्रसार कार्यकर्त्ता, शिक्षक/पर्यावरणविद या शोधकर्ता हों, और सामाजिक नेटवर्क के प्रवेश की दर में वृद्धि के कारण कृषकों से इनके वर्धित संवाद के चलते किसानों में शस्य सुरक्षा रसायनों के खतरों के बारे में जागरूकता बढ़ी है। यह, वस्तुत:, न केवल मौद्रिक अर्थ में, बल्कि कृत्रिम रासायनिक जैवनाशकों के उपयोग की व्यवहार्यता/औचित्य सहित सामाजिक-पर्यावरणीय दृष्टि से शत्रुजीव प्रबंधन के लिए रासायनिक विकल्पों के पुनर्मूल्यांकन की ओर अग्रसर कर रहा है। रासायनिक शत्रुजीव नियंत्रण न केवल महँगा है, बल्कि इसके अपने निहितार्थ भी हैं जैसे कि अन्यथा द्वितीयक शत्रुजीव या मामूली शत्रुजीव के प्राकृतिक शत्रुओं का विनाश जिससे यह मामूली शत्रुजीव अपने  प्राकृतिक शत्रुओं के अभाव में शस्य की अधिक हानि का कारण बनता है और संबंधित भौगोलिक क्षेत्र में द्वितीयक या मामूली शत्रुजीव से प्रमुख शत्रुजीव की स्थिति तक उन्नत हो जाता है। यह एक मुख्य कारण है जिसके चलते कई क्षेत्रों में रासायनिक जैवनाशियों के उपयोग में वृद्धि के कारण शत्रुजीव परिदृश्य  बिलकुल परिवर्तित हो गया है (पेशिन एवं साथी (२००७)। इसके अतिरिक्त, शत्रुजीवों में रासायनिक जैवनाशियों के लिए प्रतिरोध के विकास की वर्धित दर के कारण नए जैवनाशक अणु के विकास में लगने वाला पैसा भी इसके अंतिम उपयोगकर्ता, यानी किसान की जेब से ही तो निकाला जाता है। पादप संरक्षण रसायनों के वर्धित और अविवेकपूर्ण अनुप्रयोग ने कर्षण क्रियाओं द्वारा शत्रुजीव नियंत्रण के विशेष संदर्भ के साथ शत्रुजीव नियंत्रण के अन्य उपायों की प्रभावकारिता को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है। शत्रुजीव नियंत्रण के लिए कृषि रसायनों के अविवेकपूर्ण अनुप्रयोग से कीट प्रबंधन की लागत में वृद्धि के माध्यम से फसल की लागत में वृद्धि हुई है और इसलिए रासायनिक कीट नियंत्रण कई चरणों में महँगा (और लंबे समय में अनार्थिक) सिद्ध हुआ है। ऐसी जटिल और विकल्पहीन स्थिति में शत्रुजीवों से होने वाली हानि को अधिक किफायती और सार्थक तरीके से रोकने के लिए एकीकृत शत्रुजीव प्रबंधन (आईपीएम) रणनीतियों को लागू करने की आवश्यकता है। अपने बहु-आयामी दृष्टिकोण के कारण, आईपीएम लक्षित शस्य-शत्रुजीवों का कुशल प्रबंधन करता है जिसमें सुनिश्चित स्थायित्व और शत्रुजीव में प्रतिरोध के विकास की न्यूनतम संभावनाएँ होती हैं।

आईपीएम और कृषक आय में वृद्धि:
कृषक आय वृद्धि को दो संदर्भों में देखने की आवश्यकता है- उपज के श्रेष्ठतर मूल्य के माध्यम से आय में वृद्धि और खेती की लागत में कमी के माध्यम से निवेश में कमी। हम निम्नलिखित अनुच्छेद में इन दो संदर्भों में एकीकृत कीट प्रबंधन की भूमिका की परिकल्पना करेंगे:
                श्रेष्ठतर भोजन, श्रेष्ठतर मूल्य: जैविक खाद्य उत्पादन के लिए आधुनिक कृषि में आईपीएम की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। जैविक उपज बाजार में उच्च मूल्यों पर क्रय जाती है और कृषक के  आय वर्धन में योगदान के लिए कई गुना अधिक पैसा मिलता है। इसलिए, आय में सुधार करने वाले गुणवत्तायुक्त खाद्य पदार्थों के उत्पादन के लिए कृषि में आईपीएम आवश्यक है।
              खेती की लागत में कटौती करने के लिए संसाधन संरक्षण: आईपीएम कृषि में संसाधन संरक्षण की विषय-वस्तु के मूल में है। शस्य-अवशिष्ट, जो रोगजनकों और कीटों के लिए भोजन और आश्रय के स्रोत के रूप में काम करता है, को शस्य-पोषण के लिए गुणवत्तायुक्त उच्च पोषण मूल्य वाली कार्बनिक खाद में परिवर्तित किया जा सकता है। इस तरह की गुणवत्ता वाली खाद को नीम या करंज की खली या ट्राइकोडर्मा जैसे बायोकेन्ट्रोल एजेंटों के साथ सोधकर मिट्टी में मिलाया जा सकता है, ताकि मृदा शत्रुजीवों की संख्या को कम किया जा सके और जिससे श्रेष्ठतर खेती, उन्नत पौध-उद्भवन और प्रति इकाई क्षेत्रफल में फसल के पौधों की एक अच्छी संख्या सुनिश्चित हो सके। जैविक शत्रुजीवनाशक एकीकृत कीट प्रबंधन का  एक अभिन्न अंग हैं जो शत्रुजीव प्रबंधन के लिए पादप सुरक्षा रसायनों पर हमारी निर्भरता को कम करते हैं। क्षेत्र में प्रमुख शत्रुजीवों के लिए प्रतिरोधी शस्य प्रजातियों का उपयोग आईपीएम की सर्वोत्तम रणनीतियों में से एक है। इसमें प्रतिरोधी किस्म के बीज की खरीद में केवल एक बार का निवेश शामिल है और यह शत्रुजीव प्रबंधन प्रक्रियाओं की उन सभी जटिलताओं से राहत प्रदान करता है जो फसल में शत्रुजीव के आक्रमण के बाद अपनाए जाते हैं। जब तक कि प्रबंधन के उपाय प्रभावकारी हों, तब तक शत्रुजीव से होते रहने वाली हानि के चलते प्रतिरोधी किस्मों के उपयोग की विधि शत्रुजीव नियंत्रण/प्रबंधन के अन्य विकल्पों/उपायों की तुलना में आर्थिक रूप से अधिक लाभकारी ठहरती है। आईपीएम के अनुप्रयोग से मृदा की कार्बनिक और सूक्ष्मजीववैज्ञानिक स्थिति में सुधार होता है जो कृषि में पादप संरक्षण रसायनों के अनुप्रयोग के स्तर को नीचे लाने में निश्चय ही सहायक सिद्ध होगा तथा मृदा पारिस्थितिक वैशिष्ट्य को बढ़ावा देते हुए संपोष्य कृषि में महत्वपूर्ण योगदान देगा।
               खेती की प्रक्रिया का अनुकूलन: आईपीएम शत्रुजीव से शस्य हानि को कम करने के लिए कृषि की प्रक्रिया के अनुकूलन को रेखांकित करता है। अधिकतम संभव रिटर्न प्राप्त करने की दिशा में यह संसाधन और कृषि निवेशों का इष्टतम उपयोग सुनिश्चित करता है।

कुछ उदाहरण:
भारत में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्-राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान केन्द्र (आईसीएआर-नेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट) ने कई फसलों में आईपीएम मॉड्यूल्स की प्रभावकारिता का आकलन करने के लिए देश भर में कई परीक्षण किए हैं और बीदर (कर्नाटक) में चने में २.४ के लागत : लाभ अनुपात के साथ इसकी उपज में १९७% प्रतिलाभ की सूचना दी है (शर्मा एवं साथी (२०१६)। इसी अध्ययन में, अरहर में आईपीएम मॉड्यूल को अपनाने के बाद ४.० के लागत:लाभ अनुपात के साथ इसी स्थान पर उपज में १६४% की वृद्धि की सूचना मिली है। सरसों में माहू के प्रबंधन के साथ एक अध्ययन में कुल आय में रु.१७२३५.१७/हेक्टेयर की वृद्धि के साथ उपज में २६७.२५% की वृद्धि दर्ज की गई, और उच्चतम लागत:लाभ अनुपात ११.८१ दर्ज किया गया (पांडे एवं सिंह (२००८)। राजस्थान के श्रीगंगानगर में मूँगफली में तीन आईपीएम मॉड्यूल्स की आर्थिक व्यवहार्यता की जाँच करते हुए प्रथम मॉड्यूल के साथ शुद्ध आय में ७३.७६% के वृद्धि की सूचना है (सिंह एवं साथी (२०१६)

इसलिए, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि किसानों की आय में संभावित वांछित वृद्धि लाने के लिए आईपीएम में न केवल फसल उत्पादकता में वृद्धि करने की क्षमता है, बल्कि रासायनिक कीट प्रबंधन पर खर्च में पर्याप्त कमी और फसल पारिस्थितिकी की प्रकृति के निकट बहाली के लिए भी पर्याप्त सामर्थ्य है।

Friday, 8 June 2018

धान की फसल को रोगों तथा कीटों से बचाने के लिए बीज उपचार करें


धान की फसल को रोगों तथा कीटों से बचाने के लिए बीज उपचार करें
खरीफ मौसम के आगमन के दृष्टिगत काशी हिन्दू विश्वविद्यालय-कृषि विज्ञान केन्द्र, बरकछा, मीरजापुर के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. जय पी. राय की सलाह है कि किसान बन्धु धान की फसल को रोगों तथा कीटों से बचाने के लिए बुआई से पूर्व बीजों का उपचार अवश्य करें। बीज उपचार अनेक फसल सुरक्षा समस्याओं का एक छोटा, अल्प  श्रमसाध्य, अत्यन्त सस्ता तथा बहुत ही प्रभावी उपाय होता है। धान की फसल में आक्रमण करने वाले विभिन्न रोगों तथा कीटों के लिए अलग-अलग प्रकार के बीज उपचार प्रभावी होते हैं। इनमें धान के कवकजनित रोगों तथा मूल सम्बन्धी समस्याओं के लिए ट्राइकोडर्मा के संरूप की ५ से १० ग्राम मात्रा का प्रति किग्रा बीज के उपचार के लिए प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त जैव अभिकर्मक की अनुपलब्धता की स्थिति में कवकनाशी रसायनों का प्रयोग किया जा सकता है। इनमें बेनलेट अथवा मैंकोजेब रसायन प्रमुख हैं जिनकी ३ ग्राम मात्रा का प्रति किग्रा धान के बीजों के उपचार के लिए प्रयोग किया जाता है। धान की फसल के जीवाणुजनित रोगों जैसे जीवाणु पर्णच्छद झुलसा की रोकथाम के लिए स्यूडोमोनास फ्लुओरेसेन्स के ०.५ प्रतिशत घुलनशील चूर्ण संरूप की १० ग्राम मात्रा से प्रति किग्रा धान के बीजों का उपचार किया जाता है।
कीटों तथा सूत्रकृमियों से छुटकारा पाने के लिए बीजों का उपचार मोनोक्रोटोफ़ॉस नामक रसायन के ०.२  प्रतिशत जलीय घोल में बीजों को ६ से ८ घण्टों तक डुबाकर करना चाहिए। दीमकों के प्रकोप वाले स्थानों पर क्लोरपाइरीफ़ॉस नामक रसायन की ३  ग्राम मात्रा से प्रति किग्रा धान के बीज का उपचार करना चाहिए।


Thursday, 24 December 2015

बैंगन की फसल को फल एवं प्ररोह वेधक कीट से बचाएं

बैंगन की फसल को फल एवं प्ररोह बेधक कीट से बचाएं
डॉ. जय पी. राय 
असिस्टेंट प्रोफेसर एवं फसल सुरक्षा वैज्ञानिक
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय-कृषि विज्ञान केन्द्र,
बरकछा, मीरजापुर-२३१००१
बैंगन भारत प्रमुख सब्ज़ी फसलों में से है। एक अनुमान के अनुसार देश में लगभग ४ लाख ७२ हज़ार हेक्टेयर क्षेत्रफल से ७६ लाख ७६ हज़ार मीट्रिक टन बैंगन का उत्पादन किया जाता है जिसके मुताबिक देश में इस सब्ज़ी फसल की उत्पादकता १६.३ मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर ठहरती है। देश में  बैंगन की खेती करने वाले प्रदेशों में उड़ीसा, बिहार, कर्नाटक पश्चिम बंगाल आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश प्रमुख हैं। बैंगन मधुमेह के रोगियों के लिए फायदेमंद होने के साथ-साथ विटामिन ए, सी तथा खनिजों का उत्तम स्रोत है
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि सब्ज़ियों में रोगों और कीटों का प्रकोप प्रमुख समस्या है जिसके चलते प्रतिवर्ष आर्थिक रूप से महत्त्वपूर्ण इन फसलों में १० से ३० प्रतिशत तक का नुकसान होता है। बैंगन इसका अपवाद नहीं है और बाज़ार की दृष्टि से प्रमुख इस महत्वपूर्ण सब्ज़ी फसल पर प्रतिवर्ष अन्य रोगों तथा कीटों के अतिरिक्त प्ररोह बेधक कीट का भी प्रकोप होता है जो इस सब्ज़ी फसल से प्राप्त होने वाले उपज को भारी नुकसान पहुंचाता है और किसानों को उसी अनुपात में आर्थिक हानि का सामना करना करना पड़ता है। एक अनुमान के अनुसार इस कीट द्वारा ३० से ५० प्रतिशत फलों की हानि होती है। इससे सहज ही इस कीट के महत्व का पता चलता है  बैंगन के फल एवं प्ररोह वेधक कीट का जंतु-वैज्ञानिक नाम ल्युसिनोडिस ऑर्बोनालिस है तथा यह लेपिडोप्टेरा गण के पाईरॉस्टिडी का सदस्य है। यह एकभक्षी कीट है तथा सामान्य रूप से बैंगन की ही फसल को नुकसान पहुंचाता है हालाँकि अत्यंत विषम परिस्थितियों में यह मटर तथा कद्दूवर्गीय पौधों समेत सोलेनेसी कुल के अन्य पौधों जैसे आलू आदि पर भी जीवित रह सकता है। इस कीट का प्रकोप एशिया तथा अफ्रीका के बैंगन की खेती करने वाले सभी उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में होता है। कीट के आक्रमण से न केवल फसल के उत्पादन में गिरावट आती है, बल्कि इससे उसकी बाजार गुणवत्ता भी उल्लेखनीय रूप से प्रभावित होती है। बैंगन के फलों में कीट द्वारा छेद कर दिया जाता जिससे उपभोक्ता ऐसे फलों को खरीदने से मना कर देते हैं अथवा इनको अत्यंत कम दाम पर खरीदते हैं। इसके अलावा प्रभावित फलों में कीट द्वारा किये गए छेद से कवकों तथा जीवाणुओं का प्रवेश सुगम हो जाता है और ऐसे फल सड़ने लग जाते हैं। अतः फल एवं प्ररोह वेधक कीट द्वारा न केवल उपज की मात्रात्मक हानि होती है बल्कि इससे होने वाले गुणात्मक हानि से फसल का बाजार मूल्य गिर जाता है और किसान को दोहरा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
सभी सब्ज़ी फसलों की तुलना में बैंगन में प्रयोग होने वाले फसल सुरक्षा रसायनों की मात्रा काफी अधिक होती है और इसके पीछे स्पष्ट रूप से कीटों तथा रोगों का प्रकोप मुख्य कारण हैं। बैंगन में प्रति हेक्टेयर लगभग ४.६ किग्रा फसल सुरक्षा रसायनों का प्रयोग किया जाता है जो मिर्च (५.१३ किग्रा) के बाद दूसरे स्थान पर आता है। सब्ज़ी फसलों में कीटों और रोगों के प्रबंधन के लिए प्रयोग किए जाने वाले कृषि सुरक्षा रसायनों की मात्रा में कमी की जा सकती है बशर्ते फसल सुरक्षा के लिए नियमित और दूरदर्शी उपाय अपनाये जाएँ। समेकित फसल सुरक्षा के उपाय इस संबंध में विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं जिनका प्रयोग करके किसान अपनी कृषि में पर्यावरण तथा मानव स्वास्थ्य लिए घातक इन हानिकारक रसायनों की मात्रा में उल्लेखनीय कमी कर सकते हैं ।
आर्थिक क्षति स्तर का विचार:
जैसा कि हम जानते हैं, किसी कीट का आर्थिक क्षति स्तर उस कीट की संख्या के उस स्तर को कहा जाता है जिस पर कि वह आर्थिक रूप से हानिकारक सिद्ध होने लगे। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी कीट की संख्या सदैव ही हानि पहुंचाने के स्तर तक नहीँ होती। उपयुक्त और अनुकूल परिस्थितियों में जब कीट की संख्यावृद्धि होती है तो एक स्तर ऐसा आता है जबकि कीट आर्थिक रूप से क्षतिकारक सिद्ध होने लगता है। इस स्तर पर कीट द्वारा की जाने वाली हानि (आर्थिक रूप में) और उसके नियंत्रण पर होने वाला व्यय-दोनों समान होते हैं। इस कीट के लिए आर्थिक क्षति स्तर कीट द्वारा की गई हानि का 1 से 5 प्रतिशत तक होना है। कहने का तात्पर्य यह है कि जब कीट द्वारा की गई हानि 1 से 5 प्रतिशत के बीच हो तो रासायनिक उपाय प्रारम्भ कर देने चाहिए।
कीट द्वारा की गई हानि के लक्षण:
इस कीट के आक्रमण के लक्षण सम्भवतः सर्वाधिक स्पष्ट होते हैं। जैसा कि नाम से पता चलता है, कीट पौधे पर पर्णवृन्तों और तनों के ऊपरी भागों (प्ररोहों) तथा फलों में छिद्र करता है और छिद्र को मल से बन्द कर देता है। मादा पौधों की पत्तियों, कोमल तनों, फूलों तथा फलों पर पर अलग-अलग १५०-३५० अंडे देती है जो क्रीमी-सफेद रंग के होते हैं। अण्डों के फूटने के बाद निकला कीट का लार्वा निकटतम कोमल शाखा, टहनी अथवा फल पर आक्रमण करता है और उसमें छेद बनाकर प्रवेश कर जाता है। प्रवेश के बाद अंदर ही अंदर कीट की सूंड़ी सुरंग बनाकर प्ररोह तथा फल के मध्य भाग को खाती रहती है। प्रभावित प्ररोह ऊपर से मुरझाकर लटक जाते हैं और आगे चलकर सूख जाते हैं। नव-विकसित फलों में आक्रमण की अधिकता के चलते उनका विकास अवरुद्ध हो जाता है और वे सूखकर पौधे से अलग हो जाते हैं। विकसित होने वाले फलों में कीट के आक्रमण से विकृति उत्पन्न हो जाती है और फल टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं। पूर्ण विकसित फलों में कीट के आक्रमण के फलस्वरूप द्वितीयक कवकों और जीवाणुओं के प्रवेश के कारण उनमें सड़न प्रारम्भ हो जाती है और फल सड़कर नष्ट हो जाते हैं। प्ररोहों के सूखकर नष्ट हो जाने के कारण न केवल पौधे की वृद्धि बल्कि उसका समग्र विकास प्रभावित होता है जिसका सीधा असर उसकी उत्पादकता पर पड़ता है। आक्रांत प्ररोहों पर आने वाले फूल मुरझा जाते हैं तथा उनमें फलों का निर्माण नहीं होता। पौधे से प्राप्त होने वाले फलों का आकार, उनका भार तथा प्रति पौधा फलों की संख्या काफी घट जाती है। इस प्रकार किसान को दोहरा नुकसान उठाना पड़ जाता है। हालाँकि कीट द्वारा नष्ट प्ररोहों के स्थान पर नए प्ररोह आते हैं किन्तु इससे फसल की परिपक्वता अवधि बढ़ जाती है। इसके अलावा नए प्ररोहों पर भी कीट के आक्रमण की संभावना भी बनी रहती है। खेत में पौधों के प्ररोहों का मुरझाकर लटक जाना इस कीट की उपस्थिति और इसके प्रकोप का प्रमुख लक्षण है।
कीट के प्रबंधन की तकनीक:
१. चूँकि कीट स्वभाव से एकभक्षी अथवा मोनोफैगस होता है, यानि सामान्यतः बैंगन के पौधे से अपना भोजन प्राप्त करता है अतः फसल-चक्र का पालन इस कीट के प्रबंधन की एक अत्यंत सुगम एवं सुरक्षित विधि है।
२. बैंगन की कीट-प्रतिरोधी प्रजातियों का प्रयोग सर्वाधिक संतोषप्रद विधि है। इसके लिए प्रतिरोधी प्रजातियों में अण्णासलाई, पूसा पर्पल राउंड आदि शामिल हैं।
३. ऐसे पौधों अथवा फसलों के साथ बैंगन की अंतर्फसली  खेती, जिनसे प्राकृतिक आवास की गुणवत्ता में सुधार होता हो (जैसे मक्का, धनिया तथा लोबिया आदि) इस कीट के प्रबंधन में सहायक सिद्ध होती है। खेत में इन फसलों के पौधों की मौजूदगी से फसलों के शत्रुकीटों के प्राकृतिक शत्रुओं अथवा कृषि के मित्रजीवों (जैसे मकड़ियां, लेसविंग्स तथा लेडीबर्ड बीटल) की संख्या में निरंतर वृद्धि होती है जिससे शत्रुकीटों की संख्या पर दीर्घकालिक रूप से प्रभावी नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता  है।
४. आक्रांत पौधे से प्रभावित प्ररोहों, फलों तथा अन्य भागों का खेत से बाहर ले जाकर उन्मूलन कीट को खेत में स्थापित होने से रोकता है। इससे कीट की संख्यावृद्धि अप्रत्याशित रूप से नहीं होने पाती और फसल की अवधि में होने वाली संभावित हानि की मात्रा में कमी की जा सकती है। पौध अवशेषों पर ही कीट के लार्वा अपनी उत्तरजीविता सुनिश्चित करने के लिए प्यूपा में परिवर्तित होते हैं, जिसे खेत में साफ-सफाई के द्वारा रोका जा सकता है। इसके लिए अभियान चलाना कीट प्रबंधन का कारगर उपाय है। आक्रांत पौधे के प्रभावित भागों को पौधे से अलग करके खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर देना चाहिए अथवा उनकी कम्पोस्टिंग कर देनी चाहिए।
४. फेरोमोन ट्रैप के प्रयोग द्वारा कीटों को सामूहिक रूप से फंसाकर उनको प्रजनन से रोका जा सकता है। इसके लिए अल्पमोली जल नालिका का प्रयोग किया जा सकता है। ट्रैप की संख्या प्रति एकड़ ४० से ६० के बीच रखी जानी चाहिए। ये ट्रैप केवल नर कीटों को ही फंसाते हैं और नर कीटों की संख्या घट  जाने से मादा कीटों के अण्डों का निषेचन बाधित होता है जिससे कीट की संख्यावृद्धि पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा कीट के वयस्कों को सामूहिक रूप से मारने के लिए प्रति हेक्टेयर १ अथवा इससे अधिक प्रकाश-प्रपंचों का भी प्रयोग किया जा सकता है।
५. जून के अंत तक पौधों की रोपाई कर देने से कीट का प्रकोप कम पाया गया है। रोपाई के पूर्व पौधों की जड़ों को इमिडाक्लोप्रिड नामक रसायन के ०.१ प्रतिशत घोल (१ मिली रसायन प्रति लीटर पानी की दर से) में ३ घंटों तक डुबोकर रखना चाहिए।
६. रोपाई के ३० दिन बाद २५० किग्रा नीम की खली प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में प्रयोग करना चाहिए। रोपाई के १० दिनों के बाद कार्बोफुरान ३जी की ३० किग्रा मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिलानी चाहिए।
७. फसल की रोपाई के एक महीने बाद से प्रारम्भ करके  प्रति पखवाड़ा (१५ दिनों के अंतराल पर) निम्नलिखित रसायनों का अदल-बदल कर खड़ी  फसल में छिड़काव करना चाहिए:
  • एज़ाडिरेक्टिन ०.०३ प्रतिशत
  • नीम आयल ०.२ प्रतिशत (२ मिली प्रति लीटर पानी में  घोल बनाकर)
  • नीम गिरी का सत ५ प्रतिशत
  • प्रोफेनफोस ०.०५ प्रतिशत
  • क्विनॉलफॉस ०.२ प्रतिशत (२ मिली प्रति लीटर पानी में  घोल बनाकर)   
  • कार्बरिल ५० डब्ल्यू पी २ ग्राम प्रति लीटर पानी में  घोल बनाकर