Sunday, 14 April 2019

समेकित नाशीजीव प्रबंधन (आईपीएम) और आय में वृद्धि


समेकित नाशीजीव प्रबंधन (आईपीएम) और आय में वृद्धि

डॉ. जय पी. राय


कृषि उत्पादकता बढ़ाने के उद्देश्य से उत्पादन तकनीक में वैज्ञानिक विकास लगभग एक स्थायित्व पर पहुँच गया है और किसान की आय को बढ़ाने के लिए उत्पादन तकनीक में विकास के आधार पर फसल उत्पादकता में लघुगणकीय वृद्धि पर्याप्त सीमा तक असंभव प्रतीत होती है । इसलिए, खेती के व्यवसाय से लाभ बढ़ाने के लिए अन्य संभावित विकल्पों पर ध्यान देना आवश्यक हो गया है। पादप संरक्षण तकनीक ऐसी क्षमता प्रदान करती है क्योंकि फसलों में कीटों और रोगों से होने वाले नुकसान काफी अभूतपूर्व हैं और अगर इसे रोक लिया जाय तो इससे फसल की उपज और किसान की आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव हो सकती है।

रासायनिक नाशीजीव नियंत्रण बनाम एकीकृत कीट प्रबंधन:
समकालीन शस्य उत्पादन में, किसान रोग एवं कीट नियंत्रण के लिए अधिकतर शस्य सुरक्षा रसायनों के प्रयोग पर भरोसा करते हैं। हालांकि, किसानों से सीधे संपर्क वाले लोगों की बढ़ती गतिविधियों के कारण, चाहे वे प्रसार कार्यकर्त्ता, शिक्षक/पर्यावरणविद या शोधकर्ता हों, और सामाजिक नेटवर्क के प्रवेश की दर में वृद्धि के कारण कृषकों से इनके वर्धित संवाद के चलते किसानों में शस्य सुरक्षा रसायनों के खतरों के बारे में जागरूकता बढ़ी है। यह, वस्तुत:, न केवल मौद्रिक अर्थ में, बल्कि कृत्रिम रासायनिक जैवनाशकों के उपयोग की व्यवहार्यता/औचित्य सहित सामाजिक-पर्यावरणीय दृष्टि से शत्रुजीव प्रबंधन के लिए रासायनिक विकल्पों के पुनर्मूल्यांकन की ओर अग्रसर कर रहा है। रासायनिक शत्रुजीव नियंत्रण न केवल महँगा है, बल्कि इसके अपने निहितार्थ भी हैं जैसे कि अन्यथा द्वितीयक शत्रुजीव या मामूली शत्रुजीव के प्राकृतिक शत्रुओं का विनाश जिससे यह मामूली शत्रुजीव अपने  प्राकृतिक शत्रुओं के अभाव में शस्य की अधिक हानि का कारण बनता है और संबंधित भौगोलिक क्षेत्र में द्वितीयक या मामूली शत्रुजीव से प्रमुख शत्रुजीव की स्थिति तक उन्नत हो जाता है। यह एक मुख्य कारण है जिसके चलते कई क्षेत्रों में रासायनिक जैवनाशियों के उपयोग में वृद्धि के कारण शत्रुजीव परिदृश्य  बिलकुल परिवर्तित हो गया है (पेशिन एवं साथी (२००७)। इसके अतिरिक्त, शत्रुजीवों में रासायनिक जैवनाशियों के लिए प्रतिरोध के विकास की वर्धित दर के कारण नए जैवनाशक अणु के विकास में लगने वाला पैसा भी इसके अंतिम उपयोगकर्ता, यानी किसान की जेब से ही तो निकाला जाता है। पादप संरक्षण रसायनों के वर्धित और अविवेकपूर्ण अनुप्रयोग ने कर्षण क्रियाओं द्वारा शत्रुजीव नियंत्रण के विशेष संदर्भ के साथ शत्रुजीव नियंत्रण के अन्य उपायों की प्रभावकारिता को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है। शत्रुजीव नियंत्रण के लिए कृषि रसायनों के अविवेकपूर्ण अनुप्रयोग से कीट प्रबंधन की लागत में वृद्धि के माध्यम से फसल की लागत में वृद्धि हुई है और इसलिए रासायनिक कीट नियंत्रण कई चरणों में महँगा (और लंबे समय में अनार्थिक) सिद्ध हुआ है। ऐसी जटिल और विकल्पहीन स्थिति में शत्रुजीवों से होने वाली हानि को अधिक किफायती और सार्थक तरीके से रोकने के लिए एकीकृत शत्रुजीव प्रबंधन (आईपीएम) रणनीतियों को लागू करने की आवश्यकता है। अपने बहु-आयामी दृष्टिकोण के कारण, आईपीएम लक्षित शस्य-शत्रुजीवों का कुशल प्रबंधन करता है जिसमें सुनिश्चित स्थायित्व और शत्रुजीव में प्रतिरोध के विकास की न्यूनतम संभावनाएँ होती हैं।

आईपीएम और कृषक आय में वृद्धि:
कृषक आय वृद्धि को दो संदर्भों में देखने की आवश्यकता है- उपज के श्रेष्ठतर मूल्य के माध्यम से आय में वृद्धि और खेती की लागत में कमी के माध्यम से निवेश में कमी। हम निम्नलिखित अनुच्छेद में इन दो संदर्भों में एकीकृत कीट प्रबंधन की भूमिका की परिकल्पना करेंगे:
                श्रेष्ठतर भोजन, श्रेष्ठतर मूल्य: जैविक खाद्य उत्पादन के लिए आधुनिक कृषि में आईपीएम की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। जैविक उपज बाजार में उच्च मूल्यों पर क्रय जाती है और कृषक के  आय वर्धन में योगदान के लिए कई गुना अधिक पैसा मिलता है। इसलिए, आय में सुधार करने वाले गुणवत्तायुक्त खाद्य पदार्थों के उत्पादन के लिए कृषि में आईपीएम आवश्यक है।
              खेती की लागत में कटौती करने के लिए संसाधन संरक्षण: आईपीएम कृषि में संसाधन संरक्षण की विषय-वस्तु के मूल में है। शस्य-अवशिष्ट, जो रोगजनकों और कीटों के लिए भोजन और आश्रय के स्रोत के रूप में काम करता है, को शस्य-पोषण के लिए गुणवत्तायुक्त उच्च पोषण मूल्य वाली कार्बनिक खाद में परिवर्तित किया जा सकता है। इस तरह की गुणवत्ता वाली खाद को नीम या करंज की खली या ट्राइकोडर्मा जैसे बायोकेन्ट्रोल एजेंटों के साथ सोधकर मिट्टी में मिलाया जा सकता है, ताकि मृदा शत्रुजीवों की संख्या को कम किया जा सके और जिससे श्रेष्ठतर खेती, उन्नत पौध-उद्भवन और प्रति इकाई क्षेत्रफल में फसल के पौधों की एक अच्छी संख्या सुनिश्चित हो सके। जैविक शत्रुजीवनाशक एकीकृत कीट प्रबंधन का  एक अभिन्न अंग हैं जो शत्रुजीव प्रबंधन के लिए पादप सुरक्षा रसायनों पर हमारी निर्भरता को कम करते हैं। क्षेत्र में प्रमुख शत्रुजीवों के लिए प्रतिरोधी शस्य प्रजातियों का उपयोग आईपीएम की सर्वोत्तम रणनीतियों में से एक है। इसमें प्रतिरोधी किस्म के बीज की खरीद में केवल एक बार का निवेश शामिल है और यह शत्रुजीव प्रबंधन प्रक्रियाओं की उन सभी जटिलताओं से राहत प्रदान करता है जो फसल में शत्रुजीव के आक्रमण के बाद अपनाए जाते हैं। जब तक कि प्रबंधन के उपाय प्रभावकारी हों, तब तक शत्रुजीव से होते रहने वाली हानि के चलते प्रतिरोधी किस्मों के उपयोग की विधि शत्रुजीव नियंत्रण/प्रबंधन के अन्य विकल्पों/उपायों की तुलना में आर्थिक रूप से अधिक लाभकारी ठहरती है। आईपीएम के अनुप्रयोग से मृदा की कार्बनिक और सूक्ष्मजीववैज्ञानिक स्थिति में सुधार होता है जो कृषि में पादप संरक्षण रसायनों के अनुप्रयोग के स्तर को नीचे लाने में निश्चय ही सहायक सिद्ध होगा तथा मृदा पारिस्थितिक वैशिष्ट्य को बढ़ावा देते हुए संपोष्य कृषि में महत्वपूर्ण योगदान देगा।
               खेती की प्रक्रिया का अनुकूलन: आईपीएम शत्रुजीव से शस्य हानि को कम करने के लिए कृषि की प्रक्रिया के अनुकूलन को रेखांकित करता है। अधिकतम संभव रिटर्न प्राप्त करने की दिशा में यह संसाधन और कृषि निवेशों का इष्टतम उपयोग सुनिश्चित करता है।

कुछ उदाहरण:
भारत में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्-राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान केन्द्र (आईसीएआर-नेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट) ने कई फसलों में आईपीएम मॉड्यूल्स की प्रभावकारिता का आकलन करने के लिए देश भर में कई परीक्षण किए हैं और बीदर (कर्नाटक) में चने में २.४ के लागत : लाभ अनुपात के साथ इसकी उपज में १९७% प्रतिलाभ की सूचना दी है (शर्मा एवं साथी (२०१६)। इसी अध्ययन में, अरहर में आईपीएम मॉड्यूल को अपनाने के बाद ४.० के लागत:लाभ अनुपात के साथ इसी स्थान पर उपज में १६४% की वृद्धि की सूचना मिली है। सरसों में माहू के प्रबंधन के साथ एक अध्ययन में कुल आय में रु.१७२३५.१७/हेक्टेयर की वृद्धि के साथ उपज में २६७.२५% की वृद्धि दर्ज की गई, और उच्चतम लागत:लाभ अनुपात ११.८१ दर्ज किया गया (पांडे एवं सिंह (२००८)। राजस्थान के श्रीगंगानगर में मूँगफली में तीन आईपीएम मॉड्यूल्स की आर्थिक व्यवहार्यता की जाँच करते हुए प्रथम मॉड्यूल के साथ शुद्ध आय में ७३.७६% के वृद्धि की सूचना है (सिंह एवं साथी (२०१६)

इसलिए, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि किसानों की आय में संभावित वांछित वृद्धि लाने के लिए आईपीएम में न केवल फसल उत्पादकता में वृद्धि करने की क्षमता है, बल्कि रासायनिक कीट प्रबंधन पर खर्च में पर्याप्त कमी और फसल पारिस्थितिकी की प्रकृति के निकट बहाली के लिए भी पर्याप्त सामर्थ्य है।

Thursday, 14 June 2018

नव प्रवर्तन: भारत को विश्वगुरु की आसंदी पर पुनर्प्रतिष्ठापित करने का एकमेव माध्यम


मित्रों,
भारतवर्ष संभावनाओं का देश है. ऐसा मैं इसलिए कह सकता हूँ क्योंकि सम्पूर्ण विश्व में सबसे अधिक युवा मस्तिष्क भारत में निवास करता है. सवा सौ करोड़ हमारी जनसंख्या नहीं, हमारी ‘जहनसंख्या’ के लिहाज से अहम है. यदि इतनी विशाल संख्या में मानव मस्तिष्क किसी वृहत्तर लक्ष्य के प्रति गंभीर हो जाए तो वह सहज ही प्राप्त हो सकता है. यह वृहत्तर लक्ष्य समाज के कल्याण का होना चाहिए, चाहे उसके साधन, माध्यम अथवा उपकरण कुछ भी हों. अरुणाचलम मुरुगनाथन का नाम आप सबने सुना ही होगा- इन्हें ‘पैडमैन ऑफ़ इण्डिया’ के नाम से भी जाना जाता है और इनके जीवन तथा संघर्ष की कहानी पर एक लोकप्रिय फिल्म का निर्माण भी हुआ है. मुझे आशा है, आपने वह फिल्म अवश्य देखी होगी. उन्होंने महिला स्वच्छता और स्वास्थ्य को समाज कल्याण के एक उपलक्ष्य के रूप में चुना और वह कर दिखाया, जिसको असंभव मानकर लोग उनका मजाक उड़ाते थे और उन्हें पागल तक घोषित करने पर आमादा थे. कम कीमत वाले सैनिटरी नैपकिन बनाने वाली मशीन बनाकर उन्होंने समाज कल्याण के साथ-साथ महिलाओं के आत्म-सम्मान की रक्षा भी की. ऐसे अनेक मुरूगनाथन हमारे बीच हैं लेकिन उनके मस्तिष्क को उस सीमा तक झकझोरने के लिए आवश्यक उत्प्रेरक संभवत: कम हैं. नव प्रवर्तन तभी संभव होता है जब आप के पास ऐसा संकल्प हो, जो आपको कुछ और सोचने न दे, कुछ और करने न दे. इसके साथ ही चाहिए समाज की रूढ़ियों और स्थापित मान्यताओं से भिड़ने का हौसला, जिसको हासिल करने के लिए विवेकपूर्ण रूप से बेहद जिद्दी होना आवश्यक है.
नव प्रवर्तन का जन्म तभी संभव है जब विचारों का, अवधारणाओं का, ज्ञान का और क्षमताओं का मुक्त प्रवाह सुनिश्चित किया जाय. कई बार हम देखते हैं कि अनुभवजन्य ज्ञान शिक्षा के परम्परागत रूप से प्राप्त ज्ञान से काफी अलग होता है. यह विलगाव अथवा अंतर अनेक कारकों के द्वारा उत्पन्न किया हुआ हो सकता है जिनमें स्थानीयता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. शिक्षा ज्ञान को परिष्कृत, प्रशस्त और पुष्ट करने का कार्य अवश्य करती है किन्तु ज्ञान अपने अस्तित्व के लिए शिक्षा पर पूरी तरह निर्भर नहीं होता. भारतवर्ष में ज्ञान से समृद्ध ऐसे लोगों की बहुलता है जिन्हें अधिक शिक्षा प्राप्ति का अवसर नहीं मिला. वे आर्थिक रूप से गरीब भी हो सकते हैं, किन्तु उनके अंदर अनेक जटिल समस्याओं का सरल समाधान निकाल लेने की अद्भुत क्षमता है. राष्ट्र के सामने यह एक चुनौती है कि ऐसे लोगों के ज्ञान और उनकी क्षमताओं का पूरा लाभ उठाया जाय ताकि समस्याओं का व्यापक रूप से समाधान संभव किया जा सके. हमारा पारंपरिक ज्ञान भी काफी समृद्ध है और इसकी व्यावहारिकता पर कदाचित ही कोई प्रश्नचिन्ह लगा हो. इस ज्ञान को बदलते समय में उभर कर आने वाली नवीन समस्याओं के निराकरण के लिए कैसे प्रयोग किया जा सकता है, यह अपने आप में नव प्रवर्तन का एक बड़ा क्षेत्र है. ज्ञान का लम्बे समय तक संरक्षण तभी किया जा सकता है जब उसकी प्रासंगिकता और व्यावहारिकता दूरगामी हो. इसके लिए ज्ञान का मुक्त प्रसार एक अनिवार्य शर्त है क्योंकि एक स्थान पर उपलब्ध ज्ञान स्थानीय स्तर पर अप्रासंगिक होने के बावजूद दूसरे अन्य स्थानों पर न केवल प्रासंगिक हो सकता है, वरन उसकी व्यावहारिकता भी उच्च स्तर की हो सकती है. ज्ञान को स्थानीयता से मुक्त करना अपने आप में एक बड़ा कार्य है और इसे तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि जनसामान्य को जागरूक करके उनके मस्तिष्क में वैज्ञानिक चेतना का विकास न किया जाय. यही एकमात्र साधन है जिससे हम नव प्रवर्तन के लिए उन्मुख मस्तिष्क तथा प्रतिभाओं को चिन्हित कर सकते हैं. समाज में प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य बनता है कि ऐसी प्रतिभाओं को सामने लाने में अपनी भूमिका तथा अपना योगदान सुनिश्चित करे. आप लोगों में से अधिकतर लोग अपने-अपने गांवों के प्रमुख हैं और इसलिए आपकी ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है कि अपने क्षेत्र में किसी भी ऐसी प्रतिभा को न केवल प्रोत्साहन दें, बल्कि उसे उपयुक्त मंच प्रदान करने में सक्रिय रूप से योगदान करें. समाज में यत्र-तत्र बिखरी ऐसी प्रतिभाओं को उनकी प्रतिभा के विकास, उसके पल्लवन तथा पुष्पन के लिए आवश्यक वातावरण प्रदान करके वृहत्तर समाज के कल्याण में उनके ज्ञान का उपयोग समस्याओं के निराकरण द्वारा किया जा सकता है.
नव प्रवर्तन में स्कूलों की भूमिका संभवत: सबसे अधिक महत्वपूर्ण है और इसीलिए विज्ञान के हमारे अध्यापकों का उत्तरदायित्व भी बढ़ जाता है. एक अनगढ़ मस्तिष्क की उर्वरा शक्ति को विकसित करना आसान कार्य नहीं है और संभवत: इसीलिए हम शिक्षा के पारम्परिक ढांचे पर प्रश्नचिन्ह लगाने का प्रयत्न नहीं करते. किताबी ज्ञान को रटने का केन्द्र बनने के बजाय हमारे स्कूल विद्यार्थी के मस्तिष्क में विचारों की खेती करने के केंद्र बनने चाहिए. तभी जाकर हम अपनी प्रतिभाओं को सही दिशा दे पाने में पूर्ण रूप से सक्षम होंगे. हम एक चेतनमना नागरिक के तौर पर अपने समाज में इन बातों को सुनिश्चित करने में सुविधानुसार अपनी भूमिका तय तो कर ही सकते हैं.
जिला विज्ञान क्लब के माध्यम से नियमित रूप से वैज्ञानिक प्रदर्शनी के आयोजनों द्वारा विगत वर्षों में हमने देखा है कि जनपद मीरजापुर में निवास करने वाला मस्तिष्क कितना उर्वर है, इसमें पलने वाले विचार कितने व्यापक हैं और इसकी क्षमताएँ कितनी वृहत हैं. इस प्रकार के आयोजन न केवल विचारों के मुक्त प्रवाह को रास्ता देते हैं बल्कि एक दूसरे से संपर्क द्वारा नवीन विचारों के जन्म का भी माध्यम बनते हैं. इस अवसर पर वैज्ञानिक समुदाय नव प्रवर्तकों के ज्ञान की परख तो करता ही है, उसे परिष्कृत और पुष्ट करने का भी कार्य करता है. कुल मिलाकर हमें ऐसा मुक्ताकाशी वातावरण बनाना है जिसमें कोई भी रचनाशील मस्तिष्क अपने विचारों, अवधारणाओं तथा सिद्धांतों को व्यावहारिक धरातल पर उतारने के लिए भरपूर उड़ान भर सके. हम सभी इस पुनीत कार्य में एक दूसरे के पूरक और प्रेरक की तरह कार्य करेंगे, आइये इसका संकल्प लें.
आप सभी का अनेक धन्यवाद और आभार!!

Friday, 8 June 2018

धान की फसल को रोगों तथा कीटों से बचाने के लिए बीज उपचार करें


धान की फसल को रोगों तथा कीटों से बचाने के लिए बीज उपचार करें
खरीफ मौसम के आगमन के दृष्टिगत काशी हिन्दू विश्वविद्यालय-कृषि विज्ञान केन्द्र, बरकछा, मीरजापुर के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. जय पी. राय की सलाह है कि किसान बन्धु धान की फसल को रोगों तथा कीटों से बचाने के लिए बुआई से पूर्व बीजों का उपचार अवश्य करें। बीज उपचार अनेक फसल सुरक्षा समस्याओं का एक छोटा, अल्प  श्रमसाध्य, अत्यन्त सस्ता तथा बहुत ही प्रभावी उपाय होता है। धान की फसल में आक्रमण करने वाले विभिन्न रोगों तथा कीटों के लिए अलग-अलग प्रकार के बीज उपचार प्रभावी होते हैं। इनमें धान के कवकजनित रोगों तथा मूल सम्बन्धी समस्याओं के लिए ट्राइकोडर्मा के संरूप की ५ से १० ग्राम मात्रा का प्रति किग्रा बीज के उपचार के लिए प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त जैव अभिकर्मक की अनुपलब्धता की स्थिति में कवकनाशी रसायनों का प्रयोग किया जा सकता है। इनमें बेनलेट अथवा मैंकोजेब रसायन प्रमुख हैं जिनकी ३ ग्राम मात्रा का प्रति किग्रा धान के बीजों के उपचार के लिए प्रयोग किया जाता है। धान की फसल के जीवाणुजनित रोगों जैसे जीवाणु पर्णच्छद झुलसा की रोकथाम के लिए स्यूडोमोनास फ्लुओरेसेन्स के ०.५ प्रतिशत घुलनशील चूर्ण संरूप की १० ग्राम मात्रा से प्रति किग्रा धान के बीजों का उपचार किया जाता है।
कीटों तथा सूत्रकृमियों से छुटकारा पाने के लिए बीजों का उपचार मोनोक्रोटोफ़ॉस नामक रसायन के ०.२  प्रतिशत जलीय घोल में बीजों को ६ से ८ घण्टों तक डुबाकर करना चाहिए। दीमकों के प्रकोप वाले स्थानों पर क्लोरपाइरीफ़ॉस नामक रसायन की ३  ग्राम मात्रा से प्रति किग्रा धान के बीज का उपचार करना चाहिए।


Sunday, 1 April 2018

कद्दूवर्गीय सब्जियों का गोंदिया तना झुलसा (गमी स्टेम ब्लाइट) अथवा काला सड़न रोग तथा इसकी रोकथाम




भारतवर्ष की अधिकांश जनसंख्या शाकाहारी है और इस कारण से यहाँ के लोगों के आहार में सब्जियों तथा फलों का विशेष  महत्त्व है। सभी प्रकार की सब्जियों में कद्दूवर्गीय सब्जी फसलों का प्रमुख स्थान इसलिए होता है क्योंकि ये सब्जियाँ प्रायः वर्षभर उपलब्ध रहतीं हैं तथा पौष्टिकता के मामले में इनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है। भारत के उत्तरी मैदानी भागों में गर्मी के मौसम में, जबकि अधिकतम वनस्पतियाँ सूख जातीं हैं और बिना संरक्षित कृषि के हरी सब्जियों की खेती संभव नहीं होती, कद्दूवर्गीय सब्जियाँ घर-आँगन तथा पिछवाड़े लता की तरह उगाई जा सकतीं हैं और इस कठिन समय में मानव पोषण का महत्त्वपूर्ण साधन होती हैं।

सभी प्रकार की वनस्पतियों की भाँति कद्दूवर्गीय सब्जी फसलों में भी अनेक प्रकार के रोगों का आक्रमण होता है। ये रोग न केवल सब्जी उत्पाद की गुणवत्ता में गिरावट के लिए उत्तरदायी होते हैं बल्कि उत्पादों तथा उपज की मात्रा में भी भारी कमी करते हैं जिससे न केवल सब्जी उत्पाद की मात्रा में कमी होती है बल्कि उसके पोषण मान पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। गोंदिया/चिपचिपा तना झुलसा (गमी स्टेम ब्लाइट) और काला सड़न (ब्लैक राॅट) खरबूजा, तरबूज और ककड़ी की एक सामान्य बीमारी है। ये दोनों एक ही रोग के दो नाम अथवा दो विभिन्न अवस्थाएँ हैं। जब रोग पत्तियों तथा तनों को संक्रमित करता है तो यह अंगमारी के लक्षण उत्पन्न करता है तथा ऐसे में इसे गोंदिया तना झुलसा (गमी स्टेम ब्लाइट) रोग कहा जाता है। इसके विपरीत जब रोग का संक्रमण फलों पर आता है तो यह फलों के विगलन अथवा सड़न के लक्षण उत्पन्न करता है और तब इसे काला सड़न (ब्लैक राॅट) रोग कहा जाता है। यह काला सड़न वाली अवस्था फसल कटाई के बाद भी जारी रह सकती है। सड़न के कारण फलों में दुर्गन्ध आने लगती है। 

रोग के लक्षण तथा इसकी पहचानः
गोंदिया तना झुलसा रोग के लक्षण पहले पत्तियों के किनारों पर प्रकट होते हैं। पत्तियों के किनारों पर भूरे रंग के धब्बे बनते हैं जो धीरे-धीरे अन्दर की ओर बढ़ते जाते हैं। कद्दू, ककड़ी और समर स्क्वैश में पर्ण संक्रमण अंग्रेजी के अक्षर ‘वी’ के आकार वालेे भूरे रंग के धब्बों के रूप में पर्णफलक के ऊतकों में विकसित होता है। इन पर्णीय धब्बों को श्यामव्रण (एन्थ्रैक्नोज) के धब्बों के साथ आसानी से भ्रमित हुआ जा सकता है। हालांकि, चिपचिपा तना झुलसा के घाव अपेक्षाकृत गहरे रंग के, लक्ष्य पट्टिका (टारगेट बोर्ड) की तरह अथवा धारीदार स्वरूप (जोनेट पैटर्न) वाला होता है और इससे पत्ती के ऊतकों का क्षय श्यामव्रण की अपेक्षा कम होता है। तरबूज में भूरापन शिराओं के बीच भूरे रंग के विवर्णन या भूरे/गहरे लाल रंग के गोलाकार धब्बे के रूप में प्रकट होता है। इन धब्बों के चारों ओर पीले रंग का घेरा (हैलो) हो सकता है और पुराने धब्बे प्रायः शुष्क और फटे होते हैं। विन्टर स्क्वैश में तने अथवा पत्ती में गोंदिया/चिपचिपा तना झुलसा अवस्था नहीं प्रकट होती है किन्तु फल बनते समय काला सड़न अवस्था विकसित हो सकती है। कद्दूवर्गीय सब्जी फसलों में गोंदिया तना झुलसा अवस्था संक्रमित तनों पर विकसित होती है, जो अक्सर पौधे के शीर्ष के निकट होता है। संक्रमण के ये घाव आमतौर पर खुले होते हैं और इनसे चिपचिपे, तृणमणि (अम्बर) रंग के द्रव का स्रावण होता है। तनों पर होने वाले संक्रमणों में मुहांसों की भाँति उठी हुई रचनाएँ दिखाई देती हैं जिनके भीतर रोगकारक कवक के बीजाणुओं का उत्पादन होता है। इन बीजाणुधानियों से चिपचिपे निःस्राव निकलते हैं। फलों की सड़न प्रारम्भ में जलसिक्त धब्बों के रूप में दिखाई देती है जो आगे चलकर पूरी तरह काले रंग के हो जाते हैं। फलों का संक्रमण खड़ी फसल की अवस्था अथवा भंडारण, दोनों ही क्षेत्रों में विकसित हो सकता है।

रोगजनक तथा रोग की जैविकीः
कद्दूवर्गीय फसलों का गोंदिया/चिपचिपा तना झुलसा अथवा काला सड़न रोग एक कवकजनित रोग है और इसका कारक डिडिमेल्ला ब्राॅयनी नामक कवक होता है। यह रोगजनक कवक पौधों की सतह पर बने विक्षतों (घावों) के माध्यम से पौधे में प्रवेश करता है। ये विक्षत कीटों जैसे भृंगों (बीटल्ज़), माहुओं (एफिड्स) और रोगों जैसे चूर्णिल आसिता (पाउडरी मिल्ड्यू) से पीड़ित पौधों में बनते हैं। यही कारण है कि कीटमुक्त पौधों की तुलना में कीटों की वजह से मामूली रूप से घायल होने की वजह से कीट-प्रभावित पौधों में काला सड़न और चिपचिपा तना झुलसा रोग अधिक होता है। रोग सामान्यतः पौधे के मध्य भाग से प्रारम्भ होता है और बाहरी ओर को बढ़ता है। लताओं पर रोग का प्रारम्भिक संक्रमण सामान्यतः गाँठों पर होता है जो लता (तने) पर ऊपर तथा नीचे की ओर लम्बवत् बढ़ता है। यह संक्रमण जलसिक्त धारियों के रूप में प्रकट होता है जो आगे चलकर समय के साथ पीले-भूरे से लेकर धूसर रंग का हो सकता है। षुश्क मौसम में तनों के संक्रमित भाग फट जाते हैं तथा उनसे गोंद जैसा चिपचिपा पदार्थ स्रावित होना प्रारम्भ हो जाता है। गोंदिया तना झुलसा तथा काला सड़न रोग के लिए रोगजनक कवक का निवेशद्रव्य संक्रमित बीज के माध्यम से खेतों में आ सकता है और पुरानी फसल के मलबे में एक फसली मौसम से दूसरे फसली मौसम तक जीवित रहता है। नम मौसम होने पर वर्षा ऋतु में कवक के नए निवेशद्रव्य (बीजाणु) उत्पन्न होते हैं जो पानी की बूँदों के आघात (वर्षा के छींटों) तथा पत्तियों पर मौजूद नमी के द्वारा पूरे क्षेत्र में आसानी से फैल जाते हैं। उच्च वातावरणीय आर्द्रता रोग के प्रकोप तथा प्रसार की दर में वृद्धि करने में सहायक होती है। संक्रमण के लिए रोगजनक के निवेशद्रव्य का स्रोत संक्रमित फसल के अवशेष, मिट्टी, खरपतवार और संक्रमित बीज होते हैं। निवेशद्रव्य का प्रसार हवा और हवा के धाराओं के माध्यम से फैलने वाले बीजाणुओं के द्वारा सम्पन्न होता है। 

रोग की रोकथाम तथा इसका प्रबन्धनः
स्वस्थ फसल से प्राप्त साफ, शुद्ध तथा प्रमाणित बीज सदैव ही भरोसेमन्द स्रोत से खरीदें क्योंकि संक्रमित बीजों के माध्यम से रोग का प्रसार नवीन क्षेत्रों तक संभव हो जाता है। संक्रमित फसल से कभी भी बीज एकत्रित न करें। एक ही स्थान में कद्दूवर्गीय परिवार के किसी भी सदस्य का रोपण करने से पहले इसका अन्य कुल के सब्जियों के साथ दो या अधिक वर्षों तक का फसल-चक्र अपनाएँ। जल प्रबन्धन के लिए जहाँ तक संभव हो, ऊपरी छिड़काव (स्प्रिंकलर) के बजाय ड्रिप सिंचाई का उपयोग करें। छोटे बगीचों में मौसम के अंत में संक्रमित फल और लताएँ खेत से बाहर निकालें और उन्हें सुरक्षित रूप से नष्ट करें। बड़े क्षेत्रों में, फसली मौसम के अंत में संक्रमित फसल अवशेषों को सुरक्षित रूप से नष्ट करने के लिए उन्हें खेत से निकालकर किसी बगीचे अथवा अनुत्पादक भूमि में ले जाकर मिट्टी में गाड़ दें अथवा मिट्टी का तेल डालकर जला दें। फसल में पौधभक्षी कीटों के प्रबन्धन के साथ-साथ बुआई के लिए चूर्णिल आसिता (पाउडरी मिल्ड्यू) के लिए प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग करें या इस रोग को नियंत्रित करने के लिए उपयुक्त कवकनाशियों का छिड़काव करें। ककड़ी के भृंग (बीटल) और अन्य कीट जैसे माहू आदि कीटों को नियंत्रित करने के लिए एकीकृत कीट प्रबंधन प्रथाओं का उपयोग करें। रोग के रासायनिक प्रबन्धन के लिए न केवल वाणिज्यिक उत्पादकों बल्कि किसानों को भी विशिष्ट कवकनाशी सिफारिशों के लिए वैज्ञानिकों अथवा विशेषज्ञों से संपर्क करना चाहिए। एक सामान्य संस्तुति के अनुसार गोंदिया/चिपचिपा तना झुलसा तथा काला सड़न रोग के रासायनिक प्रबन्धन के लिए क्लोरोथैलोनिल अथवा मैंकोजेब का जलीय घोल (0.2 प्रतिशत) छिड़काव के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।

Monday, 12 June 2017

दलहनी फसलों में रोग प्रबन्धन

                    दलहनी फसलों में रोग प्रबन्धन

               प्रोटीन की अधिक मात्रा के साथ-साथ दलहनी फसलें नत्रजन की प्रचुरता के लिए जानी जातीं हैं। संभवतः इसी कारण इन फसलों पर रोगों तथा शत्रुकीटों का प्रकोप अधिक होता है। इन फसलों पर रोग उत्पन्न करने वाले जैविक कारकों में कवक अथवा फफूँद, जीवाणु, विषाणु तथा सूत्रकृमि प्रमुख हैं। इनके अलावा पुष्पी  पादप परजीवी भी इन फसलों को प्रभावित करते हैं। दलहनी फसलें रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील होतीं हैं तथा इनमें रोगों द्वारा होने वाली हानि भी अपेक्षाकृत अधिक होती है। इनके बीजों से स्रावित होने वाले पदार्थों में पादप रोगजनकों को आकर्षित करने वाले तत्त्वों की प्रधानता होती है जिसके कारण इन फसलों में लगने वाले रोगों की गंभीरता में भी वृद्धि होती है। ये रोगजनक विभिन्न दलहनी फसलों में पौध गलन, मूल विगलन, उकठा तथा पर्णधब्बे जैसे रोग उत्पन्न करते हैं। इन रोगों के कारण दलहनी फसलों की उत्पादकता में काफी कमी आ जाती है और किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। प्रस्तुत लेख में प्रमुख दलहनी फसलों के महत्त्वपूर्ण रोगों के बारे में चर्चा की गई है जो किसान बन्धुओं के लिए हितकर होगी।

१. चूर्णिल आसिता अथवा भभूतिया रोगः
               यह रोग कवक अथवा फफूँद के द्वारा होता है जिसका नाम एरिसाइफी पाइसाइ (पॉलीगोनी) है। मटर के अलावा यह रोग उड़द तथा मूँग पर भी पाया जाता है। इसके लक्षण पौधे के सभी वायवीय भागों पर आते हैं तथा प्रभावित अंगों पर धब्बे बनते हैं जिनमें सफेद रंग का चूर्ण बिखरा हुआ दिखाई देता है जो बाद में चलकर भूरे-काले रंग में बदल जाता है। कई छोटे धब्बे आपस में मिलकर बड़े धब्बों का निर्माण करते हैं जिससे पौधे के प्रभावित भाग झुलस जाते हैं तथा पत्तियों का अधिकांश भाग धब्बों के कारण प्रकाश-संश्लेषण नहीं कर पाता जिससे पौधे का पोषण प्रभावित होता है और पौधा अपनी पूरी क्षमता से उत्पादन नहीं दे पाता। पत्तियों के अलावा रोग के लक्षण पौधे के कोमल तनों तथा प्रतानों पर भी पाए जाते हैं।

               रोगजनक कवक मिट्टी में दबे पौधे के संक्रमित भागों पर जीवित रहता है। अतः खेत की साफ-सफाई रोग प्रबन्धन की दिशा में पहला कारगर उपाय है। इसके अलावा रोग प्रतिरोधी प्रजातियों की बुआई करके भी रोग के द्वारा होने वाली हानि को कम किया जा सकता है। मूँग तथा उड़द की अगेती किस्मों पर इस रोग का प्रकोप कम होता है। मूँग की टीएआरएम-1, टीएम-96-2, टीजेएम-3 प्रजातियाँ इस रोग के लिए रोग प्रतिरोधी, कामदेवा (ओयूएम 11-5), गंगा-1 (एमएच-96-1), बीएम-2002-1, केकेएम-3, वीबीएन (जीजी) 3 मध्यम प्रतिरोधी तथा बीएम-4, जेएम-721, पीडीएम-84-178, पीकेवीएकेएम 4 (एकेएम 9904), पीकेवी ग्रीन गोल्ड तथा पूसा-9072 प्रजाति इस रोग के लिए सहिष्णु है। उर्द की प्रजातियों में डब्ल्यूबीजी-26, माश 479 (केयूजी 479) तथा सीओ 6 (सीओबीजी 653), माश 391 (एलयू 391), वीबीएन (बीजी) 7 (वीबीजी 04-008) चूर्णिल आसिता रोग के लिए प्रतिरोधी है। इसकी गुजरात-1 तथा यूपीयू 00-31 (हिमाचल माश 1) प्रजातियाँ मध्यम प्रतिरोधी तथा एकेयू-15 इस रोग के लिए सहिष्णु है। मटर की प्रजातियों में जेपी-885, केएफपी-103 (शिखा), डीएमआर-7 (अलंकार), एचएफपी-8909 (उत्तरा), सपना, स्वाति, जयंती, मालवीय मटर-15, पूसा प्रभात, अम्बिका, पूसा पन्ना, शुभ्रा, जय (केपीएमआर-522), आदर्श, विकास, प्रकाश, पारस, पन्त मटर-14, वीएल मटर-42, पन्त मटर-25, एचएफपी-9426 आदि चूर्णिल आसिता रोग के लिए प्रतिरोधी हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिए रासायनिक उपाय भी किए जा सकते हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए उपलब्ध रसायनों में सल्फेक्स का 0.3 प्रतिशत, केराथेन, कैलिक्सिन अथवा कार्बेण्डाजिम के 0.1 प्रतिशत जलीय घोल का छिड़काव किया जा सकता है।

२. पीला चित्रवर्ण (मोजैक) रोगः
               मूँग तथा उड़द का यह प्रमुख रोग विषाणुओं के कारण होता है जिनका संचार सफेद मक्खियों द्वारा किया जाता है। ये मक्खियाँ रोगी पौधों से रस चूसने के दौरान विषाणुओं को ग्रहण कर लेतीं हैं तथा उन्हें स्वस्थ पौधों में रस चूषण के दौरान संचारित कर देतीं हैं। यह रोग मूँग तथा उड़द उगाने वाले सभी क्षेत्रों में व्यापक रूप से पाया जाता है जिसके कारण फसल को अत्यधिक हानि पहुँचती है। फसल की प्रारंभिक अवस्था में रोग का संक्रमण हो जाने पर फसल को सर्वाधिक हानि पहुँचती है।

               रोग के लक्षण फसल की प्रारंभिक अवस्था में बीजों के अंकुरण के 1-2 सप्ताह बाद दिखाई देने प्रारंभ होते हैं। रोग के प्रारंभिक लक्षण सबसे ऊपरी पत्ती पर पीले-हरे धब्बों के रूप में पाए जाते हैं। संक्रमित पौधों की वृद्धि रुक जाती है तथा उनसे मिलने वाले उत्पादन की मात्रा घट जाती है। संक्रमित पौधों की पत्तियों पर अनियमित आकार के हल्के पीले रंग के चकत्ते दिखाई देते हैं। ये चकत्ते आपस में मिलकर बड़े चकत्तों का निर्माण करते हैं जिसके चलते ये चकत्ते शीघ्र ही पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं। बाद में चलकर संक्रमित पत्तियाँ पूरी पीली हो जातीं हैं तथा पौधों का रूप-रंग बदल जाता है। रोगजनक संक्रमित पौधों के अलावा संक्रमित खरपतवारों तथा अन्य दलहनी फसलों पर उत्तरजीवी रहता है। इसके लिए खेत की साफ-सफाई तथा खरपतवारों का नियंत्रण रोग के प्रबन्धन के लिए महत्त्वपूर्ण है। रोग प्रतिरोधी प्रजातियों की बुआई करनी चाहिए। इस रोग के लिए मूँग की प्रतिरोधी प्रजातियों में एमयूएम-2, एमएल-613, पन्त मूँग-4, पूसा-9531, पूसा विशाल, आईपीएम-99-125, सीओसीजी-912, मुस्कान (एमएच-96-1), केएम-2241, स्वाती (केएम-2195) तथा आईपीएम 2-14 प्रमुख हैंउड़द की प्रतिरोधी प्रजातियों में नरेन्द्र उर्द-1, केयू-301, टीयू-94-2, आजाद उर्द-1 (केयू 92-1) उत्तरा (आईपीयू 94-1), शेखर-2 (केयू-300), मैश-479 (केयूजी-479), मैश-114 तथा पन्त उर्द-31 प्रमुख हैं। इसके अलावा रोग प्रबन्धन के लिए रोगी पौधों का सुरक्षित रूप से अविलम्ब उन्मूलन कर देना चाहिए ताकि संचारी कीटों के लिए रोग का निवेशद्रव्य उपलब्ध न हो सके। संचारी कीट-सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए मेटासिस्टॉक्स अथवा डाईमेथोएट के 0.1 प्रतिशत जलीय घोल का छिड़काव नियमित अन्तराल पर करते रहना चाहिए।

३. सर्कोस्पोरा पर्णदागः
               मूँग तथा उड़द का यह रोग एक कवक सर्कोस्पोरा केनेसेन्स के द्वारा उत्पन्न किया जाता है। रोग के लक्षण प्रायः पत्तियों पर ही दिखाई देते हैं। संक्रमित पौधों की पत्तियों पर भूरे रंग के अनियमित आकार के वृत्ताकार धब्बे पाए जाते हैं। ये धब्बे कभी-कभी फलियों पर भी दिखाई देते हैं तथा अनेक छोटे धब्बे आपस में मिलकर बड़े धब्बों का निर्माण करते हैं जिसके कारण पौधे के संक्रमित अंग (पत्तियों अथवा फलियों) का बड़ा भाग रोग की चपेट में आ जाता है। अधिक संक्रमित पत्ती भूरी पड़कर सूख जाती है। रोगजनक कवक पौधे के संक्रमित भागों पर, जो कि फसल की कटाई के उपरांत मिट्टी में गिरकर दब जाते हैं, उत्तरजीवी रहते हैं। वर्षा  अथवा अधिक नमी की दशा में रोग का प्रसार तेजी से होता है।
               
               खरपतवारों का नियंत्रण तथा रोगरोधी प्रजातियों की बुआई, रोग प्रबन्धन के प्रमुख स्तम्भ हैं। इस रोग के लिए मूँग की प्रतिरोधी प्रजातियों में कामदेवा (ओयूएम 11-5), गंगा-1 (जमनोत्री), शालीमार मूँग-1, टीएम-96-2, एसएमएल-668, एमएच-125 तथा केएम-2195 (स्वाती) प्रमुख रूप से सम्मिलित हैं जबकि उड़द की प्रतिरोधी प्रजातियों में बरखा (आरबीयू-38), शेखर-3 (केयू 309) तथा मैश-391 (एलयू-391) उल्लेखनीय हैं। रोग के रासायनिक प्रबन्धन के लिए मैंकोजेब के 0.25 प्रतिशत जलीय घोल का छिड़काव किया जा सकता है।

४. उकठा अथवा म्लानि रोगः
               चने, मसूर तथा तथा अरहर में इस रोग से संभवतः सर्वाधिक हानि होती है। प्रायः संक्रमित पौधे से कोई उत्पादन मिलने की संभावना नहीं रहती और समूचा पौधा बेकार होकर रह जाता है। सामान्य परिस्थितियों में इस रोग द्वारा होने वाली हानि को 10 प्रतिशत तक आँका गया है किन्तु संक्रमण की उग्र दशाओं में होने वाली हानि अधिक होती है। फ्यूजेरियम नामक कवक की विभिन्न प्रजातियाँ इस रोग को उत्पन्न करतीं हैं जो कि खेत की मिट्टी में संक्रमित पौधों की जड़ों (जो पिछले वर्षों में कटाई के उपरान्त खेत की मिट्टी में ही छोड़ दी गईं थीं) में उत्तरजीवी रहता है। रोग के लक्षण फसल की किसी भी अवस्था में देखे जा सकते हैं। चने में रोग के लक्षण सामान्यतया बुआई के तीन सप्ताह के अन्दर ही प्रकट होने लगते हैं। रोगग्रस्त पौधे भूमि पर गिर जाते हैं किन्तु उनका रंग कई दिनों तक हरा ही रहता है। संक्रमित पौधे को उखाड़कर देखने पर भूमि की सतह के पास पौधे के तने का भाग सामान्य से सिंकुड़ा दिखाई देता है। यह सिंकुड़न लम्बाई में तकरीबन एक इंच तक होती है। पौधे की जड़ को लम्बवत् चीरकर देखने पर उसमें संवहनी ऊतकों का विवर्णन साफ दिखाई देता है तथा उनका रंग गहरा भूरा से लेकर काला तक हो जाता है जो जड़ के मध्य भाग में लम्बवत् भूरी-काली धारियों के रूप में स्पष्ट  दिखाई देता है।

               चूँकि रोग स्वभाव में मृदाजनित होता है अतः फसल-चक्र का पालन तथा उचित खेत का चुनाव रोग प्रबन्धन के लिए आवश्यक है। गर्मी के मौसम में खेत की मिट्टी-पलट हल से गहरी जुताई करने से रोगजनक के निवेशद्रव्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा मिट्टी का सुधार करने के लिए खेत की मिट्टी में नीम, मूँगफली अथवा करंज की खली मिलाने से भी रोग की तीव्रता में कमी देखी गई है। रोगरोधी प्रजातियों की बुआई करके रोग द्वारा होने वाले नुकसान को काफी सीमा तक कम किया जा सकता है। उकठा के लिए रोगरोधी प्रजातियों में चने के लिए जीजेजी 0809, एचके 4 (एचके 05-169), राज विजय चना 201 (जेएससी 40), बीजीडी 103, जेजी 6 तथा जाकी 9218 जैसी प्रजातियों का चुनाव किया जा सकता है तथा अरहर के लिए टीएस-3आर, जवाहर (जेकेएम-189), विपुला, वीएल अरहर-1, वैशाली (बीएसएमआर-853) तथा आजाद (के 91-25) उल्लेखनीय प्रजातियाँ हैंगर्मी की ज्वार की फसल उकठा रोग के प्रबन्धन में सहायक होती है। अरहर के साथ ज्वार की मिलवाँ खेती तथा चने की पूर्ववर्ती फसल के रूप में ज्वार की खेती रोग प्रबन्धन में कारगर सिद्ध होती है। ज्वार की जड़ों से स्रावित होने वाला हाइड्रोसायनिक अम्ल अपने विषाक्त प्रभाव के कारण रोगजनक कवक की संख्या को कम कर देता है। बीजों का उपचार रोग प्रबन्धन की प्राथमिक शर्त है। बीजों को जैविक अभिकर्मक ट्राइकोडर्मा की 8 से 10 ग्राम मात्रा से प्रति किग्रा बीज का उपचार करना चाहिए। रासायनिक बीज उपचार के लिए थिरम (2ग्राम) तथा कार्बेण्डाजिम (1 ग्राम) के मिश्रण से प्रति किग्रा बीज का उपचार किया जा सकता है।

५. शुष्क मूल विगलन अथवा सूखा जड़ सड़न रोगः
               चने का यह रोग राइजोक्टोनिया बटाटिकोला नामक कवक के द्वारा होता है। यह रोग लगभग सभी चना उगाने वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। रोग की तीव्रता पौधे की आयु के साथ-साथ बढ़ती जाती है। रोग के लक्षण पौधों के विभिन्न अंगों की म्लानि अथवा सूखने के रूप में प्रकट होते हैं। संक्रमित पौधे के ऊपरी भाग की पत्तियाँ तथा उनके पर्णवृन्त मुरझाने लगते हैं तथा कुछ समय बाद पीले पड़कर सूख जाते हैं। निचली पत्तियाँ तथा तना सूखकर भूरे रंग के हो जाते हैं तथा कुछ समय बाद समूचा पौधा सूख जाता है। इस प्रकार सूखे पौधों को सूखी मिट्टी में से उखाड़ने पर मुख्य जड़ मिट्टी में ही रह जाती है तथा ऊपर का भाग टूटकर अलग हो जाता है। मिट्टी में रह गई जड़ को निकालकर देखने पर उसमें पार्श्व व पतली जड़ें नहीं दिखाई देतीं तथा मुख्य जड़ भूरे रंग की होकर सड़न के लक्षण प्रदर्शित करती है। मुख्य जड़ भंगुर हो जाती है तथा उसकी छाल अलग होने लगती है। इस प्रकार जड़ का कुछ भाग खुल जाने से उस पर काले रंग के अत्यन्त छोटे बिन्दु दिखाई देते हैं। ये रोगजनक कवक की कठोर रचनाएँ होतीं हैं जो उत्तरजीविता के लिए निर्मित की जातीं हैं।

               रोग के प्रबन्धन के लिए गर्मी के मौसम में खेत की मिट्टी-पलट हल से गहरी जुताई करनी चाहिए। इससे रोगजनक की सुषुप्त संरचनाएँ तेज धूप के सम्पर्क में आकर नष्ट हो जातीं हैं। रोग के लिए प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव करना चाहिए। चने की सीएसजे 515, भारती (आईसीसीवी-10), आलोक (केजीडी-1168), धारवाड़ प्रगति (बीजीडी 72), क्रान्ति (आईसीसीसी-37), पूसा 1088, पूसा 1103, हरियाणा काबुली चना-2 (एचके 94134) तथा जेजी-63 प्रजाति इस रोग के लिए प्रतिरोधी है जबकि जेजी-11, पन्त जी-10 (डब्ल्यूसीजी-10), अनुभव (आरसीजी 888) पूसा 1105, आशा (आरएसजी 945), अर्पिता (आरएसजी-895), आधार (आरएसजी 963), आभा (आरएसजी-807) इस रोग के लिए मध्यम प्रतिरोधी तथा सूर्या (डब्ल्यूसीजी-2) तथा गौरी (जीएनजी 421) इस रोग के प्रति सहिष्णु प्रजातियाँ हैं। रोग की तीव्रता पर नियंत्रण के लिए खड़ी फसल में अत्यधिक सूखे की स्थिति उत्पन्न नहीं होने देना चाहिए। फसल चक्र का पालन करने से रोगजनक मिट्टी में स्थापित नहीं होने पाता है और रोग का प्रकोप कम होता है।

६. एस्कोकाइटा अंगमारीः
               चने का यह रोग भी एक कवक अथवा फफूँद के कारण होता है जिसका नाम एस्कोकाइटा है। इसके लक्षण तना विगलन के रूप में गहरे भूरे विक्षतों के प्रकट होने से प्रारंभ होते हैं। अनुकूल मौसम में ये विक्षत नीचे जड़ की ओर तथा ऊपर तने की ओर बढ़ते जाते हैं। संक्रमित वयस्क पौधे के तने के चारों ओर का भाग काला बदरंग हो जाता है और गंभीर रूप से संक्रमित पौधे की मृत्यु हो जाती है। रोग की चित्तियाँ पौधे के पत्तियों के अलावा तनों और फलियों पर भी पाई जातीं हैं। फलियों पर पाई जाने वाली चित्तियों में संकेन्द्रिक वलय दिखाई देते हैं। रोगजनक कवक संक्रमित पौध-अवशेषों पर जीवित रहता है तथा मृदा में दबे संक्रमित पौध अवशेषों से प्राथमिक निवेशद्रव्य प्राप्त होता है।

               रोग के प्रबन्धन के लिए खेत की साफ-सफाई तथा खरपतवारों एवं संक्रमित पौध-अवशेषों का खेत से उन्मूलन अत्यन्त आवश्यक है। फसल-चक्र का पालन करने से रोगजनक मृदा में स्थापित नहीं होने पाता है और रोग की तीव्रता में कमी आती है। रोग प्रतिरोधी प्रजातियों की बुआई करने से रोग द्वारा होने वाली हानि को कम किया जा सकता है। इसके लिए चने की सम्राट (जीएनजी-469) तथा पीबीजी 5 प्रजाति रोग-प्रतिरोधी, सीएसजे 515, जीजेजी 809, हिमाचल चना-2 (एचके-94-134), जीपीएफ-2 (जीएफ-89-36) तथा जीएलके 28127 प्रजाति सहिष्णु पाई गई है। बीजों का उपचार रोग के प्रबन्धन में काफी सीमा तक कारगर सिद्ध हुआ है। इसके लिए बीजों को थिरम की 2.5 ग्राम मात्रा से प्रति किग्रा बीज का उपचार करना चाहिए।

७. फाइटॉफ्थोरा अंगमारीः
               यह रोग भी फाइटॉफ्थोरा ड्रेक्स्लेरी कैजेनाइ नामक कवक से होता है और अरहर की फसल का प्रमुख रोग है। इसका आक्रमण 1 से 7 सप्ताह की आयु वाले पौधों पर अधिक होता है तथा शीघ्र पकने वाली प्रजातियों में इसका प्रकोप तेज होता है। ऐसे खेत जहाँ समुचित जल-निकास की व्यवस्था नहीं होती, उनमें यह रोग  अधिक तीव्र रूप में प्रकट होता है। रोग के लक्षण पौधों की पत्तियों पर पनीले धब्बों के रूप में प्रकट होते हैं। संक्रमित पौधे के तनों पर रोग के लक्षण कॉलर (स्तम्भ-मूल संधि) क्षेत्र के पास पाए जाते हैं। ये लक्षण दबे हुए भूरे रंग के विक्षतों के रूप में होते हैं। रोगग्रस्त पत्तियों में पानी की कमी हो जाती है जिससे वे मुरझा जातीं हैं। तनों पर पाए जाने वाले भूरे रंग के विक्षत तने को चारों ओर से घेर लेते हैं जिससे उस स्थान पर तना कमजोर हो जाता है और पौध का भार न सँभाल पाने के कारण टूट जाता है। रोगजनक कवक संक्रमित पौध अवशेषों पर जीवित रहता है तथा नई फसल पर संक्रमण के लिए निवेशद्रव्य यहीं से उपलब्ध होता है। वातावरण में नमी, आकाश में बादलों की उपस्थिति, हल्की बूँदाबादी की परिस्थिति में रोग का प्रकोप तीव्र होता है।

               रोग के प्रबन्धन के लिए खेत की साफ-सफाई और खरपतवारों का उन्मूलन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। जल-निकास का उचित प्रबन्ध तथा नमी एवं आर्द्रता का नियंत्रण रोग के प्रबन्धन की कुंजी है। इसके लिए अरहर की मेंड़ों पर बुआई अत्यन्त कारगर सिद्ध हुई है। खेत में अन्तर्कृषि क्रियाओं को करते समय पौधों के तनों को चोट से बचाना चाहिए। फसल-चक्र का पालन करने से भी रोग की तीव्रता पर नियंत्रण किया जा सकता है। इसके लिए कम से कम 3 से 4 वर्ष का फसल चक्र अपनाना चाहिए। जवाहर (केएम-7) इस रोग के लिए सहिष्णु  प्रजाति है जिसमें रोग द्वारा होने वाली हानि सीमित होती है। बुआई के पूर्व बीजों का उपचार मेटालैक्ज़िल नामक कवकनाशी से 3 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से करना चाहिए। फसल की बुआई के समय पौधे से पौधे तथा पंक्तियों से पंक्तियों की दूरी संस्तुत से अधिक नहीं रखनी चाहिए। खड़ी फसल में छिड़काव के लिए मैंकोजेब, कॉपर ऑक्सीक्लोराइड आदि कवकनाशियों में से किसी एक के 0.25 प्रतिशत जलीय घोल का प्रयोग करना चाहिए।

८. वंध्य चित्रवर्ण अथवा वंध्यता मोजैक (स्टेरिलिटी मोजैक) रोगः
               यह अरहर का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रोग है जिसका प्रकोप अरहर उगाने वाले सभी क्षेत्रों में प्रमुखता से होता है। इसका रोगजनक एक विषाणु होता है जिसका संचारी कीट एक चींचड़ी-एरियोफिड माइट (एसेरिया कैजेनाइ) होती है। यह चींचड़ी आकार में अत्यन्त छोटी होती है तथा इसे नंगी आँखों से नहीं देखा जा सकता है। इसका रंग पीला अथवा नारंगी होता है। यह पत्तियों की निचली सतह पर छोटे-छोटे रोमों के बीच में चिपकी होती है तथा पत्तियों से रस चूसती रहती है। इसके शिशु तथा वयस्क, दोनों ही विषाणु का संचार कर सकने में सक्षम होते हैं। रोग के लक्षण पौधों पर देर से प्रकट होते हैं। संक्रमित पौधे अन्य पौधों से अलग हल्के हरे रंग के दिखाई देते हैं। रोगी पौधों की पत्तियों पर हल्के हरे से साधारण हरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं जो अनियमित आकार के दिखाई देते हैं। संक्रमित पौधों में फूल तथा फलियाँ नहीं आतीं हैं, पौधे झाड़ीनुमा हो जाते हैं तथा आकार में सामान्य से छोटे रह जाते हैं। रोगी पौधे फसल की अवधि पूर्ण हो जाने पर भी हरे दिखाई देते हैं। रोगजनक विषाणु संक्रमित पौधों तथा अरहर की जंगली प्रजातियों पर जीवित रहता है। खेत में मुख्य फसल के आते ही संचारी कीटों द्वारा इनका संचारण फसल पर कर दिया जाता है।

               रोग के प्रबन्धन के लिए खेत की साफ-सफाई तथा खरपतवारों का उन्मूलन आवशयक है क्योंकि रोगजनक विषाणु की उत्तरजीविता इन्हीं पर संभव होती है। रोगी पौधों को खेत से अविलम्ब निकाल फेंकना चाहिए। अरहर के साथ अन्य दलहनी फसलों का फसल चक्र अपनाने से रोग के संचारी कीट के नियंत्रण में सहायता मिलती है। रोग प्रतिरोधी प्रजातियों की बुआई करनी चाहिए। इसके लिए आशा (आईसीपीएल-87119), नरेन्द्र अरहर-1 (एनडीए-88-2), अमर (केए 32-1), आजाद (के 91-25), वैशाली (बीएसएमआर-853), शरद  (डीए 11), बीएसएमआर-736, एनडीए-2 तथा बीएसएमआर-175 रोग प्रतिरोधी, मालवीय चमत्कार (एमएएल-13), विपुला, जवाहर (जेकेएम-189), तथा अमोल (बीडीएन 708), बीडीएन 711 मध्यम प्रतिरोधी एवं गुजरात तुर-100, पूसा-9, पूसा-991, पूसा-992, जीटी-101, टीजेटी 501, बीआरजी 2 तथा जेए-4 सहिष्णु  प्रजातियाँ हैं।

                आशा है, इस लेख में प्रस्तुत सूचना दलहन के किसानों के लिए लाभप्रद होगी और वे अपनी मूल्यवान फसल को रोगों तथा व्याधियों से बचाते हुए इससे समुचित लाभ प्राप्त कर सकेंगे।

Sunday, 11 June 2017

अरहर की फसल में वंध्य चित्रवर्ण रोग का प्रबन्धन

               अरहर की फसल में वंध्य चित्रवर्ण रोग का प्रबन्धन
                         
           अरहर विश्व की छठी सबसे महत्त्वपूर्ण फसल है और इसकी खेती पचास लाख हेक्टेयर से भी अधिक क्षेत्रफल में की जाती है। इनमें एशिया तथा अफ्रीका महाद्वीप के छोटे जोत वाले किसान सम्मिलित हैं। यह भारतवर्ष की प्रमुख दलहनी फसल है जिसकी खेती खरीफ के मौसम में की जाती है। यह एक बहुउद्देशीय खाद्य दलहन है जिसे भारतीय प्रायद्वीप के सभी शुष्क क्षेत्रों में प्रमुखता से उगाया जाता है। दक्षिण एशिया के देशों में, जहाँ की अधिकांश जनसंख्या शाकाहारी है, यह प्रोटीन का प्रमुख स्रोत है तथा इन देशों में इसकी लोकप्रियता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि संपूर्ण विश्व के 90 प्रतिशत अरहर की खेती दक्षिण एशिया में की जाती है। इसकी खेती के प्रमाण कम से कम 3500 वर्ष पूर्व से मिलते हैं तथा इसकी उत्पत्ति का स्थान भारतीय प्रायद्वीप माना जाता है जहाँ के पतझड़ वाले वनों में इसकी अनेक जंगली प्रजातियाँ पाई जाती हैं।

          मानव पोषण एवं खाद्य सुरक्षा में इसके महत्त्व को किसी भी प्रकार से अनदेखा नहीं किया जा सकता। जहाँ तक अरहर के पोषण मान का प्रश्न है, इसके प्रति 100 ग्राम में 343 किलोकैलोरी ऊर्जा होती है। कुल वसा 1.5 ग्राम (कुल दैनिक आवश्यकता का 2 प्रतिशत), कोलेस्टेरॉल शून्य, सोडियम 17 मिग्रा, पोटैशियम 1392 मिग्रा (कुल दैनिक आवश्यकता का 39 प्रतिशत), कुल कार्बोहाइड्रेट 63 ग्राम (कुल दैनिक आवश्यकता का 21 प्रतिशत), खाद्य रेशा 15 ग्राम (कुल दैनिक आवश्यकता का 60 प्रतिशत), प्रोटीन 22 ग्राम (कुल दैनिक आवश्यकता का 44 प्रतिशत), कैल्शियम 13 प्रतिशत, लौह तत्त्व 28 प्रतिशत, विटामिन बी-6 15 प्रतिशत तथा मैग्नीशियम 45 प्रतिशत होता है। इसके पोषण मान का विश्लेषण करें तो प्रोटीन की प्रचुरता के अतिरिक्त न्यून वसा, कोलेस्टेरॉल रहित, सोडियम की कमी तथा पोटैशियम की प्रचुरता इसे हृदय रोग के प्रति शरीर को मजबूत बनाने के लिए उत्तम विकल्प के तौर पर प्रस्तुत करती है। खाद्य रेशे की प्रचुरता पाचन तंत्र को सुदृढ़ करने में सहायक होती है तथा इसे कब्ज़ रोगियों के लिए लाभदायक बनाती है। इसके अतिरिक्त अरहर में विटामिन बी-6, मैग्नीशियम, लौह तत्त्व तथा कैल्शियम भी पाए जाते हैं जो मानव पोषण में इसके महत्त्व को रेखांकित करते हैं।

          अरहर की खेती में विभिन्न अन्य बाधाओं के अतिरिक्त वंध्यता चित्रवर्ण (स्टेरिलिटी मोज़ैक डिज़ीज़ अथवा एसएमडी) एक प्रमुख समस्या है जिसे ‘‘हरित प्लेग (Green Plague)’’ के नाम से भी जाना जाता है। इस रोग को दिए गए नाम ‘‘हरित प्लेग’’ से ही अरहर की फसल में इस रोग की गंभीरता का अनुमान लगाया जा सकता है। यह रोग एक विषाणु के कारण होता है जो इसके प्रबन्धन को और भी दुरूह बनाता है। प्रस्तुत लेख में इस महत्त्वपूर्ण रोग के विषय में कुछ आवश्यक जानकारी दी गई है जिसका लाभ निश्चित ही कृषक बन्धुओं को मिल सकेगा, ऐसी अपेक्षा की जाती है।
 
                                                                     रोग के लक्षणः
          रोगग्रस्त पौधे आकार में छोटे रह जाते हैं तथा देखने में वे झाड़ीनुमा दिखाई पड़ते हैं। संक्रमित पौधे अन्य पौधों से अलग हल्के हरे रंग के दिखाई देते हैं। रोगी पौधों की पत्तियों पर हल्के हरे से साधारण हरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं जो अनियमित आकार के दिखाई देते हैं। रोग से प्रभावित पौधे की पत्तियाँ छोटी रह जातीं हैं तथा उन पर हरिमाहीनता वाले वलय अथवा चित्रवर्ण (मोजैक) के लक्षण प्रकट होते हैं। इस प्रकार, रोगी पौधों के झुंड को खेत में दूर से ही देखकर पहचाना जा सकता है। खेत में रोग की उपस्थिति तथा इसके प्रसार का प्रमाण इस बात से लगाया जा सकता है कि रोगी पौधों का समूह खेत में जगह-जगह हल्का पीलापन लिए हुए हरिमाहीन चकत्तों के रूप में दिखाई देता है। इन पौधों पर फूल तथा फलियाँ नहीं आतीं तथा देखने में ये झाड़ीनुमा दिखाई देते हैं। रोगी पौधे फसल की अवधि पूर्ण हो जाने पर भी हरे दिखाई देते हैं। हालाँकि रोग से प्रभावित पौधों में वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती है किन्तु इनसे प्राप्त होने वाला उत्पादन लगभग शून्य होता है। रोग का प्रभाव कभी-कभी आंशिक  भी होता है जिसमें पौधे के कुछ भाग तो रोग के लक्षण प्रकट करते हैं किन्तु शेष भाग स्वस्थ रहते हैं और इन स्वस्थ भागों से उत्पादन भी प्राप्त होता है। फसल की प्रजाति के अनुसार रोग के लक्षण निम्नलिखित तीन प्रकार के हो सकते हैंः

क. तीव्र चित्रवर्ण तथा वंध्यता
ख. हल्का (मृदु) चित्रवर्ण तथा आंशिक वंध्यता
ग. हरिमाहीन वृत्ताकार धब्बे तथा अस्पष्ट/न्यूनतम वंध्यता

                                                                          रोग का कारकः
          अरहर के वंध्यता चित्रवर्ण रोग का कारक एक पादप विषाणु है जिसे पिजनपी स्टेरिलिटी मोजैक वायरस (पीपीएसएमवी) के नाम से जाना जाता है। जो थोड़ा-बहुत जीव विज्ञान की समझ रखते हैं उनकी जानकारी के लिए इस विषाणु के कण पतले तथा अत्यधिक लचीले विषाणु सदृश कण (वायरस लाइक पार्टिकल्ज़-वीपीएलएस) होते हैं। इनका व्यास 3 से 10 नैनोमीटर होता है तथा इस विषाणु का आवरण प्रोटीन 32 किलोडाल्टन की होती है। इसमें 0.8 से 6.8 केबी की एकसूत्रीय पाँच से सात प्रमुख रिबोन्यूक्लिक अम्ल की प्रजातियाँ पाई जातीं हैं।

          रोगी पौधों से स्वस्थ पौधों तक विषाणु का प्रसार अथवा संचरण अरहर की चींचड़ी अथवा माइट के द्वारा सम्पन्न होता है जो इस विषाणु को अर्ध-सतत (नॉन-परसिस्टेंट) रीति से संचारित करती है। इस चींचड़ी को एरियोफिड चींचड़ी के नाम से जाना जाता है तथा इसका जन्तु-वैज्ञानिक नाम ‘एसेरिया कैजेनाई’ है। यह चींचड़ी अत्यन्त सूक्ष्म आकार की होने के कारण प्रायः नंगी आँखों से नहीं देखी जा सकती। यह चींचड़ी पत्तियों की निचली सतह पर नन्हें रोमों के मध्य पत्ती की सतह से चिपककर रस चूसती है तथा रस चूषण के दौरान ही रोगी पौधों से विषाणु को ग्रहण करती है और इसी प्रक्रिया के द्वारा ग्रहण किए गए विषाणु को स्वस्थ पौधों में संचारित भी करती है। इसके शिशु तथा वयस्क, दोनों ही विषाणु का संचार कर सकने में सक्षम होते हैं। रोगकारक विषाणु की भाँति यह चींचड़ी भी स्वभाव में अत्यन्त विशिष्ट होती है तथा केवल अरहर तथा इसकी वन्य प्रजातियों पर ही पाई जाती है। परीक्षणों में पाया गया कि विषाणु के शुद्धीकृत कण अरहर के पौधों में रोग नहीं उत्पन्न कर सके। इससे रोग के उत्पन्न किए जाने में चींचड़ी का अपना महत्त्व सिद्ध होता है। यह विषाणु बीज-जनित नहीं है तथा उत्तरजीविता के लिए संभवतः अरहर की वन्य अथवा अकृषित प्रजातियों एवं पौधों का उपयोग करता है। चूँकि क्षेत्र और पौधे के अनुसार रोग की तीव्रता तथा इसके लक्षणों में परिवर्तन देखा जाता है अतः इस बात की संभावना बनती है कि रोगकारक विषाणु की अनेक प्रजातियाँ पाई जातीं हैं।

                                                                  रोग का प्रबन्धनः
          रोग के प्रबन्धन के लिए खेत की साफ-सफाई तथा खरपतवारों का उन्मूलन सबसे प्राथमिक शर्त है क्योंकि रोगजनक विषाणु की उत्तरजीविता इन्हीं पर संभव होती है। इसलिए रोगी पौधों को खेत से अविलम्ब निकाल फेंकना चाहिए। अरहर के साथ अन्य दलहनी फसलों का फसल चक्र अपनाने से रोग के संचारी कीट के नियंत्रण में सहायता मिलती है। हालाँकि अरहर के साथ मोटे अनाजों जैसे ज्वार, बाजरा तथा मक्का आदि की खेती करने से रोग के प्रकोप में वृद्धि देखी गई है क्योंकि इन अर्न्तकृषित फसलों से खेत में छाया तथा नमी की मात्रा में वृद्धि होती है जो रोग के संचारी कीट एरियोफिड चींचड़ी के जीवन तथा संख्यावृद्धि में सहायक होती है।
रोगरोधी प्रजातियों का प्रयोग संभवतः रोग के प्रबन्धन के लिए सर्वाधिक कारगर एवं प्रभावी विकल्प है। इसके लिए आशा (आईसीपीएल-87119), नरेन्द्र अरहर-1 (एनडीए-88-2), अमर (केए 32-1), आजाद (के 91-25), वैशाली (बीएसएमआर-853), शरद (डीए 11), बीएसएमआर-736, एनडीए-2 तथा बीएसएमआर-175 रोग प्रतिरोधी, मालवीय चमत्कार (एमएएल-13), विपुला, जवाहर (जेकेएम-189), तथा अमोल (बीडीएन 708), बीडीएन 711 मध्यम प्रतिरोधी एवं गुजरात तुर-100, पूसा-9, पूसा-991, पूसा-992, जीटी-101, टीजेटी 501, बीआरजी 2 तथा जेए-4 सहिष्णु प्रजातियाँ हैं। अन्य उपयुक्त प्रजातियों में आईसीपी 7035, वीआर 3, पर्पल 1, डीए 32, आईसीपी 6997, बहार, बीएसएमआर 235, आईसीपी 7198, पीआर 5149, आईसीपी 8861 तथा भवानीसागर 1 आदि सम्मिलित हैं।
          रासायनिक प्रबन्धन के लिए चींचड़ीनाशी रसायनों का प्रयोग भी कुछ सीमा तक लाभकारी सिद्ध हुआ है किन्तु उपरोक्त उपायों के अभाव में यह सर्वथा अप्रभावी होता है। इसके लिए उपयुक्त चींचड़ीनाशी  रसायन यथा डाइकोफॉल के 0.1 प्रतिशत जलीय घोल का छिड़काव करना चाहिए। इसके अभाव में मोनोक्रोटोफॉस की 500मिली मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से भी प्रयोग किया जा सकता है।

Wednesday, 28 September 2016

धान की फसल में तना बेधक का प्रकोपः बचाव तथा प्रबन्धन के उपाय

धान की फसल में तना बेधक का प्रकोपः बचाव तथा प्रबन्धन के उपाय

डाॅ. जय पी. राय
असिस्टेण्ट प्रोफेसर (फसल सुरक्षा), 
कृषि विज्ञान संस्थान, 
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी 
         
           धान की फसल में बालियाँ निकल रहीं हैं अथवा निकलने वाली हैं। इस अवस्था में फसल के सबसे विनाशक शत्रु तना बेधक का प्रकोप प्रारंभ हो गया है जो विभिन्न स्थानों पर फसल की अवस्था और मौसम की अनुकूलता के अनुसार विभिन्न स्तरों तक अपना प्रभाव दिखा रहा है। चूँकि फसल की यह अवस्था आर्थिक रूप से अत्यन्त संवेदी होती है और तना बेधक कीट कल्लों (टिलर्स) की संख्या में कमी होने और बालियों के सूख जाने अथवा उनके खाली रह जाने का प्रमुख कारण है अतः धान की खेती में इसका आर्थिक महत्त्व बहुत अधिक है। इसके कारण प्रतिवर्ष धान की उपज में भारी कमी होती है और किसानों को काफी नुकसान का सामना करना पड़ता है। तनाबेधक अथवा स्टेम बोरर की लगभग छह प्रमुख प्रजातियाँ धान की खेती के लिए महत्वपूर्ण नुकसान का कारण हैं। इस कीट का लार्वा ही फसल के लिए क्षतिकारक अवस्था होती है। कीट के आक्रमण के परिणामस्वरूप तने के भीतर का भाग खोखला होकर मर जाता है जिससे पौधे का संवहन तन्त्र बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है और ऐसे पौधों पर आने वाली बालियाँ सफेद अथवा पीली दिखाई देतीं हैं तथा वे खोखली अथवा मृत होतीं हैं। प्रभावित पौधे की बाली में दाने नहीं भरते अथवा पूरी बाली ही सूख जाती है। किसान की भाषा में इसे कहें तो पौधे के बीच का सीका (गोभ) खींचते ही वह निकलकर बाहर आ जाता है।
          कीट की पहचान कुछ सामान्य तरीकों से की जाती है जो किसान अपने स्तर से ही कर सकते हैं और इनके लिए किसी वैज्ञानिक प्रेक्षण की आवश्यकता नहीं होती है। कीट के आक्रमण के प्रारम्भ में पौधों का निरीक्षण करने पर उनकी पत्तियों के किनारों पर तना बेधक कीट के भूरे रंग के अण्ड समूह दिखाई देते हैं जो कीट के संभावित प्रकोप की पुष्टि करते हैं। इन अण्डों के फूटते ही कीट के लार्वी पौधे के तने को भेदकर उसके अन्दर घुस जाते हैं तथा तने के मध्य भाग को अन्दर ही अन्दर खाना प्रारम्भ कर देते हैं। इसके परिणामस्वरूप तने के बीच का भाग अथवा केन्द्रीय गोभ सूख जाता है जिसे ऊपर से खींचने पर वह आसानी से बाहर आ जाता है। इस गोभ का सावधानी से निरीक्षण करने पर उसका निचला भाग कटा अथवा विवर्णित (भूरा) तथा सूखा दिखाई देता है। इस प्रकार के लक्षण को मृत गोभ के नाम से जाना जाता है। ऐसे पौधों में तने को बीच से फाड़कर देखने पर उसके केन्द्रीय भाग में कीट का लार्वा स्पष्ट दिखाई देता है जो कीट के आक्रमण की पुष्टि कर देता है।
          कीट के अण्डे क्रीमी सफेद रंग के होते हैं। वे चपटे, अण्डाकार, शल्क-सदृश होते हैं तथा समूह में दिए जाते हैं। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, ये अण्डे कीट की मादा द्वारा सामान्यतः पत्तियों के शीर्ष वाले किनारों पर दिए जाते हैं। कीट का अण्ड समूह नन्हें रोमों से ढका होता है जो उन्हें बाहरी क्षतिकारी कारकों से सुरक्षा प्रदान करता है। कीट के लार्वी पीले रंग के होते हैं तथा इनका सिर भूरे रंग का होता है। कीट के प्यूपा सफेद कोकून के रूप में प्रभावित तनों के अन्दर पाए जाते हैं।
          कीट के आक्रमण के लिए अनुकूल परिस्थितियों में संवेदी प्रजाति के साथ-साथ फसल में आवश्यकता से अधिक नत्रजन का प्रयोग, मृदा में सिलिका तत्त्व की कमी, शुष्क (निरन्तर वर्षा नहीं) तथा ठण्डा मौसम, उच्च वातावरणीय आर्द्रता तथा लगातार एक ही खेत में धान की खेती और पूर्व की फसल के अवशेषों को भली प्रकार नष्ट न किया जाना है।
कीट के प्रबन्धन के लिए निम्नलिखित उपायों के समन्वयन द्वारा सामूहिक प्रयास करने से अपेक्षित सफलता प्राप्त की जा सकती हैः

1. अण्ड परजीवी ट्राइकोग्रामा जैपोनिकम का मोचन
2. नीम की गिरी के सत (5 प्रतिशत) का छिड़काव
3. रोपाई के पूर्व धान की पत्तियों के सिरों को काट देने से कीट की मादा अण्डे नहीं दे पाती है, किन्तु जीवाणु           झुलसा रोग की तीव्रता वाले क्षेत्रों में इस उपाय का प्रयोग न करें।
4. अण्ड समूहों को खेत में से इकट्ठा करके मार देना चाहिए।
5. कीट के रासायनिक प्रबन्धन के लिए प्रति हेक्टेयर इनमें से किसी एक रसायन का प्रयोग कर सकते हैंः 
  • एसीफेट 75 प्रतिशत 666 से 1000 मिली
  • अजाडिरेक्टिन 0.03 प्रतिशत 1000 मिली
  • कार्बोसल्फान 6 प्रतिशत दानेदार संरूप 16.7 किग्रा
  • कार्बोसल्फान 25 प्रतिशत ईसी संरूप 800-1000 मिली
  • कार्टेप हाइड्रोक्लोराइड 50 प्रतिशत एसपी 1 किग्रा
  • क्लोरेन्ट्रानिलिप्रोल 0.4 प्रतिशत दानेदार संरूप 10 किग्रा
  • क्लोरेन्ट्रानिलिप्रोल 18.5 प्रतिशत एससी 150 मिली
  • क्लोरपाइरीफाॅस 20 प्रतिशत ईसी संरूप 1.25 लीटर
  • फिप्रोनिल 5 प्रतिशत एससी 1000-1500 ग्राम
  • फ्लुबेण्डियामाइड 20 प्रतिशत डब्ल्यूजी 125 ग्राम
  • थायाक्लोप्रिड 21.7 प्रतिशत एससी 500 ग्राम
  • थायामेथोक्जाम 25 प्रतिशत डब्ल्यूजी 100 ग्राम
  • ट्रायजोफाॅस 40 प्रतिशत ईसी 625-1250 मिली